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चीन में दवाओं के कच्चे माल की कीमत में भारी गिरावट

चीन में दवाओं के कच्चे माल की कीमत में भारी गिरावट, घट सकते हैं दवाओं के दाम

दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआई) की कीमतों में चीन में हाल के महीनों में बड़ी गिरावट आयी है।

चीन में दवाओं के कच्चे माल की कीमत में भारी गिरावट घट सकते हैं दवाओं के दाम

sharp drop in the price of raw materials for medicines in China |

नई दिल्ली। दवाइयों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआई) की कीमतों में चीन में हाल के महीनों में बड़ी गिरावट आयी है। इससे भारत में दवाओं की कीमतों में आने वाले दिनों में कमी होने की उम्मीद जतायी जा रही है। फार्मा एक्सपर्ट्स का कहना है कि API के दाम घटने से दवाओं का मैन्युफैक्चरिंग लागत कम होगी, जिससे जेनेरिक दवाइयों के दामों में कटौती संभव है।

कोरोना के बाद चीन ने भारी निवेश कर बढ़ा लिया था एपीआई का उत्पादन

कोरोना के बाद चीन ने अपनी फैक्ट्रियों में भारी निवेश कर एपीआई का उत्पादन बहुत ज्यादा बढ़ा लिया था। इससे वहां जरूरत से ज्यादा माल तैयार हो गया है। अब अधिक मात्रा में माल स्टॉक हो जाने से मांग गिर गयी है। इस वजह से एपीआई के दाम भी काफी गिर गये हैं। जल्द ही इनमें और भी कमी की उम्मीद है। फार्मा एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका सीधा फायदा दवाओं की कीमत में कमी के रूप में मरीजों को मिल सकता है।

एपीआई की कीमतों में 35 से 40% तक की आई है गिरावट

चीन में एपीआई की कीमतों में 35 से 40% तक की गिरावट आई है। उदाहरण के तौर पर पैरासिटामोल का एपीआई, जो कोविड के समय करीब 900 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया था, अब घटकर लगभग 250 रुपए प्रति किलो हो गया है। इसी तरह, एमोक्सिसिलिन और क्लैवुलानेट जैसे एंटीबायोटिक दवाओं के कच्चे माल की कीमतों में भी काफी कमी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि एपीआई सस्ता होने का सीधा असर दवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

भारत लगभग 70% एपीआई की जरूरतें चीन से करता है पूरी

भारत अपनी लगभग 70% एपीआई की जरूरतें चीन से पूरी करता है। कोविड-19 महामारी के दौरान इस कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ गई थीं, जिससे दवाइयां महंगी हो गई थीं। हालांकि अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। चीन में कोविड के बाद जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता विकसित हो गई थी, जिसके चलते अब एपीआई की सप्लाई अधिक और मांग कम हो गई है। इसी वजह से कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो दवा कंपनियों की उत्पादन लागत घटेगी और इसका फायदा ग्राहकों तक पहुंच सकता है।

एपीआई की कम कीमतें घरेलू उद्योग पर बढ़ता है दबाव

एपीआई निर्माता मानते हैं कि बहुत कम कीमतें उनके लिए नुकसानदायक हो सकती हैं, क्योंकि इससे घरेलू उद्योग पर दबाव बढ़ता है। सरकार भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करती है और जरूरत पड़ने पर अधिकतम खुदरा मूल्य में बदलाव कर सकती है। यदि कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं, तो सरकार दवाओं की कीमतों में कटौती का फैसला ले सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि दवाइयों की कीमतें तुरंत कम नहीं होंगी। कंपनियां आमतौर पर पुराने स्टॉक खत्म होने के बाद ही नई कीमतों का असर दिखाती हैं।

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