तीर्थराज प्रयागराज को यूं ही कुंभ नगरी नहीं कहा जाता। हर साल माघ महीने में यहां आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है, जिसे देखकर लगता है मानो पूरा भारत एक ही स्थान पर आ गया हो।
माघ मेले का धार्मिक महत्व
तीर्थराज प्रयागराज को यूं ही कुंभ नगरी नहीं कहा जाता। हर साल माघ महीने में यहां आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है, जिसे देखकर लगता है मानो पूरा भारत एक ही स्थान पर आ गया हो। अलग-अलग भाषाएं, वेशभूषा, परंपराएं और देवी-देवताओं में विश्वास रखने वाले लोग माघ मेले के दौरान संगम तट की ओर खिंचे चले आते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा गया है। यहां मां गंगा, मां यमुना और गुप्त रूप से बहने वाली मां सरस्वती का पवित्र संगम है। माना जाता है कि माघ मास में इस संगम पर स्नान करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
माघ मास में क्यों बढ़ जाता है प्रयागराज का महत्व
सालभर प्रयागराज में श्रद्धालु आते हैं, लेकिन माघ महीने में इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस समय सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और यही कारण है कि मकर संक्रांति से माघ स्नान की परंपरा शुरू होती है। संत तुलसीदास ने भी माघ मास की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि इस समय देवता भी त्रिवेणी में स्नान करने आते हैं।
त्रिवेणी संगम की महिमा
हिंदू मान्यता के अनुसार संगम में श्रद्धा से तीन डुबकी लगाने मात्र से मनुष्य के दोष दूर हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन संगम में स्नान करने से व्यक्ति को दिव्य लोक की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है। महाभारत के अनुसार माघ मास में प्रयागराज में 3 करोड़ 10 हजार तीर्थों का आगमन होता है। मान्यता है कि इस समय न केवल साधु-संत, बल्कि देवता भी इस पावन भूमि पर उपस्थित रहते हैं। इसी कारण माघ मेले को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
माघ स्नान का पुण्य फल
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माघ मास में संगम स्नान करने से 100 अश्वमेध यज्ञ और 1000 राजसूय यज्ञ के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। विशेष तिथियों पर स्नान करने से कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मां सरस्वती का गुप्त प्रवाह
प्रयागराज में मां गंगा और मां यमुना का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से होता है, लेकिन मां सरस्वती को गुप्त माना गया है। मान्यता है कि वे भूमिगत रूप से बहती हैं। कुछ लोग इसे सरस्वती कूप से जोड़ते हैं, तो कुछ संतों की ज्ञानमयी वाणी को ही मां सरस्वती का स्वरूप मानते हैं।
माघ मास के 10 महादान
माघ मेले के दौरान स्नान के साथ-साथ दान का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार गाय, भूमि, तिल, सोना, घी, वस्त्र, अन्न, गुड़, चांदी और नमक का दान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। माघ मास में संगम तट पर कल्पवास करने की परंपरा भी है। नियम, संयम और साधना के साथ पूरा माघ बिताने वाले व्यक्ति का तन-मन शुद्ध हो जाता है। मान्यता है कि कल्पवास से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनता है।
मोक्ष की ओर एक कदम
माघ स्नान, दान और तपस्या का समन्वय मनुष्य को मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ाता है। यही कारण है कि माघ मेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम माना जाता है।
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