इस विशेष अवसर पर हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज और ऋषिकेश जैसे पवित्र तीर्थस्थलों पर लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।
नई दिल्ली। सनातन धर्म में गंगा दशहरा का त्योहार बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह महापर्व पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन दिन पर मोक्षदायिनी मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।
क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा?
गंगा दशहरा मनाए जाने के पीछे इक्ष्वाकु वंश के राजा भगीरथ की कठिन तपस्या की कहानी जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को महर्षि कपिल के श्राप के कारण भस्म होना पड़ा था। उनके उद्धार और आत्मा की शांति के लिए केवल गंगाजल ही एकमात्र उपाय था। अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए राजा भगीरथ ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की।भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने मां गंगा को पृथ्वी पर जाने की अनुमति दी।
भगवान शिव की जटाओं में उतरी मां गंगा
गंगा जी का वेग इतना तीव्र था, कि उसे सीधे झेलने की शक्ति पृथ्वी में नहीं थी। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में रोक लिया। इसके बाद ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा जी शिव की जटाओं से निकलकर धरती पर आईं और भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया। भगीरथ के इस प्रयास के कारण ही गंगा को 'भागीरथी' भी कहा जाता है।
क्या है इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व?
'दशहरा' शब्द का अर्थ है दस पापों को हरने वाला। शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करने से मनुष्य के दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इन पापों में तीन कायिक (शारीरिक), चार वाचिक (वाणी द्वारा किए गए) और तीन मानसिक पाप शामिल हैं।इस दिन स्नान के साथ-साथ दान का भी विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। इस दिन किए गए दान-पुण्य से अक्षय फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
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