महादेव को गंगाजल, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाने की परंपरा के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी खास मान्यता मानी जाती है।
नई दिल्ली (भारत)। सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। शिवभक्त मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और उन्हें बेलपत्र, धतूरा सहित कई पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन वस्तुओं का संबंध समुद्र मंथन और भगवान शिव द्वारा हलाहल विषपान की कथा से जुड़ा हुआ है।
हलाहल पीने के कारण भगवान का नाम नीलकंठ पड़ा
पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से जब हलाहल नामक भयंकर विष निकला, तो उसकी विषाक्तता से तीनों लोकों में संकट उत्पन्न हो गया। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण उन्हें नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है।
विष की उष्णता शांत करने के लिए हुआ गंगाजल से जलाभिषेक
मान्यता है कि हलाहल विष को कंठ में धारण करने के बाद भगवान शिव के शरीर में अत्यधिक उष्णता और जलन उत्पन्न हो गई। इसे शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर जल चढ़ाया। इसी कथा से शिवलिंग पर जलाभिषेक करने की परंपरा को जोड़ा जाता है।
गंगाजल को विशेष रूप से पवित्र माना गया है। मान्यता है कि मां गंगा भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हैं। इसलिए शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करना शीतलता, पवित्रता और मन की शांति का प्रतीक माना जाता है।
बेलपत्र का शिव पूजा में विशेष महत्व
भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय माना जाता है। सामान्यतः तीन पत्तियों वाले बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है। धार्मिक व्याख्याओं में इसकी तीन पत्तियां त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का प्रतीक मानी जाती हैं। इन्हें भगवान शिव के तीन नेत्रों और त्रिशूल से भी जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि बेलपत्र का स्वभाव शीतल होता है और इसे भगवान शिव को अर्पित करने से विषपान के बाद उत्पन्न उष्णता को शांत करने का प्रतीकात्मक भाव व्यक्त होता है। भक्त बेलपत्र अर्पित करते समय भगवान शिव से सुख, शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
धतूरा क्यों चढ़ाया जाता है?
भगवान शिव की पूजा में धतूरे का भी विशेष स्थान माना गया है। धार्मिक मान्यताओं में धतूरे को विष और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। चूंकि भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की थी, इसलिए धतूरा उन्हें अर्पित करने की परंपरा को इसी कथा से जोड़ा जाता है।
धतूरा अर्पित करने का एक आध्यात्मिक अर्थ यह भी माना जाता है कि भक्त अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक भावों को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर उनसे मुक्ति की कामना करता है।
पूजा में छिपा है आध्यात्मिक संदेश
गंगाजल, बेलपत्र और धतूरा केवल पूजन सामग्री नहीं, बल्कि शिव आराधना में अलग-अलग आध्यात्मिक भावों के प्रतीक माने जाते हैं। गंगाजल शुद्धता और शीतलता, बेलपत्र समर्पण और संतुलन तथा धतूरा अपने भीतर के विष और अहंकार को त्यागने का संदेश देता है।
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