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बहज गांव: पाषाण से आधुनिक संस्कृति तक संगम

पाषाण काल से आधुनिक काल तक की संस्कृतियों का संगम है बहज गांव

राजस्थान के डीग जिले के बहज गांव में पिछले सात महीनों से चल रहे पुरातात्विक उत्खनन से करीब पांच हजार साल पुराना इतिहास सामने आने की संभावना है।

पाषाण काल से आधुनिक काल तक की संस्कृतियों का संगम है बहज गांव

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5000 साल पुरानी संस्कृति के संकेत

राजस्थान के डीग जिले के बहज गांव में पिछले सात महीनों से चल रहे पुरातात्विक उत्खनन से करीब पांच हजार साल पुराना इतिहास सामने आने की संभावना है। गोवर्धन संस्कृति 5000 वर्षों से भी अधिक प्राचीन मानी जा रही है। यह खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के जयपुर मंडल द्वारा अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. विनय कुमार गुप्ता के निर्देशन में पूरी की जा चुकी है और अब यहां से मिली चीजों का अध्ययन किया जा रहा है। यह भी माना जा रहा है कि यह स्थल 5000 वर्षों से भी ज्यादा पुराना हो सकता है। अंतिम रिपोर्ट लगभग तैयार है, लेकिन इसे ASI के महानिदेशक को सौंपने के बाद इसके प्रकाशित होने में थोड़ा समय लग सकता है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, यह गांव भले ही राजस्थान में है, लेकिन यह ब्रज क्षेत्र में आता है। मथुरा यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर है, जबकि यह स्थान करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां मिले अवशेष बताते हैं कि यह क्षेत्र हजारों साल पुरानी सभ्यता का हिस्सा रहा है। कुछ अवशेष हड़प्पा काल के समय के भी हो सकते हैं, इसलिए इसे “गोवर्धन संस्कृति” कहा जा रहा है। यह खुदाई जनवरी 2025 में शुरू हुई थी और करीब 23-24 मीटर गहराई तक की गई, जो राजस्थान में अब तक की सबसे गहरी खुदाई मानी जा रही है।

विभिन्न कालखंडों के मिले प्रमाण

डॉ. गुप्ता ने बताया कि जहां खुदाई की गई, वह टीला गांव के बीचों-बीच स्थित है। यहां पाषाण काल, ताम्र-पाषाणिक संस्कृति, प्रारंभिक लौह युगीन संस्कृति – पूर्व मौर्य काल, कुषाण काल, गुप्त काल, उत्तर गुप्त काल, मध्यकाल, मुगल काल और राजपूत काल तक की बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। इससे यह साफ होता है कि इस जगह पर हजारों सालों से लगातार लोग रहते आ रहे हैं। खुदाई के दौरान एक मानव कंकाल भी मिला है, जिसके नमूने जांच के लिए इजराइल भेजे गए हैं। यहां से लगभग 5000 महत्वपूर्ण वस्तुएं मिली हैं। इनमें लाल और धूसर रंग के मिट्टी के बर्तन शामिल हैं, जिनकी बनावट 5000 वर्ष पुरानी गणेश्वर परंपरा से मिलती-जुलती है, हालांकि कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। इसके अलावा काले-धूसर रंग के बर्तन भी मिले हैं। 15 से ज्यादा यज्ञ कुंड मिले हैं, जो यह बताते हैं कि यहां वैदिक और उत्तर वैदिक काल में धार्मिक गतिविधियां होती थीं।

पाषाण काल से जुड़े अहम साक्ष्य

डॉ. गुप्ता के अनुसार, यहां पाषाण काल के पत्थर के औजार भी मिले हैं, जिससे यह साबित होता है कि उस समय भी यहां इंसान रहते थे। ये पत्थर स्थानीय हैं, यानी इन्हें कहीं बाहर से नहीं लाया गया। इसके अलावा दो मिट्टी की मूर्तियां भी मिली हैं, जिनमें एक महिला और एक पुरुष की आकृति दिखाई देती है। माना जा रहा है कि ये शिव-पार्वती की मूर्तियां हो सकती हैं। यहां ऊर्ध्वरेतस शिवलिंग, शक्ति और भक्ति से जुड़ी मूर्तियां, टेराकोटा की डिश जैसी वस्तुएं और हड्डियों से बनी चीजें भी मिली हैं। इन वस्तुओं को इंसानी आकृति देने और उन्हें चमकाने की भी कोशिश की गई थी।

प्राचीन जीवनशैली की झलक

खुदाई में शंख, चूड़ियां, हड्डियों की कंघियां, खेती में इस्तेमाल होने वाले लोहे के औजार, शुंग और मौर्य काल के तांबे के सिक्के, सोने के तार, अर्ध-कीमती पत्थरों के मनके, महिलाओं के कंगन और मछली पकड़ने के कांटे जैसी कई चीजें मिली हैं। खास बात यह है कि नग जड़ी दो अंगूठियां भी मिली हैं, जो मौर्य काल या उससे पहले की हो सकती हैं और एक विकसित समाज की ओर इशारा करती हैं। इसके अलावा घरों के अवशेष जैसे मिट्टी के खंभे, दीवारें, गुप्त काल की संरचनाएं और धातु गलाने वाली भट्ठियां भी मिली हैं, जो उस समय के जीवन को समझने में मदद करती हैं।

ब्राह्मी लिपि की रहस्यमयी मोहरें

ब्राह्मी में "नोखर" व "जानक" लिखी मोहरें यहां से ब्राह्मी लिपि की दो बहुत पुरानी मोहरें भी मिली हैं, जिन पर सिर्फ तीन-तीन अक्षर लिखे हैं। एक पर “नोखर” और दूसरी पर “जानक” लिखा है। इन शब्दों का सही मतलब अभी तक समझ नहीं आ पाया है और वैज्ञानिक इसकी जांच कर रहे हैं। डॉ. गुप्ता का कहना है कि जब तक इनका अर्थ साफ नहीं हो जाता, तब तक इसके बारे में कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता।

प्राचीन नदी के प्रमाण

प्राचीन नदी का मार्ग मिला खुदाई के दौरान 23 मीटर की गहराई पर एक प्राचीन नदी का रास्ता भी मिला है। माना जा रहा है कि यह पौराणिक सरस्वती नदी या उसकी किसी धारा से जुड़ा हो सकता है। आमतौर पर प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित होती थीं, इसलिए यह खोज काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब इस मिट्टी और बालू की जांच से और जानकारी मिलने की उम्मीद है।

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