वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक प्रभावों को हटाने के बाद पिछले दशक में पृथ्वी 0.35°C प्रति दशक की रफ्तार से गर्म हुई, जो पहले से काफी अधिक है।
वॉशिंगटन डीसी: वैश्विक तापमान वृद्धि की रफ्तार अब पहले की तुलना में तेज हो गई है। अल नीनो, ज्वालामुखी विस्फोट और सौर चक्रों जैसे प्राकृतिक प्रभावों को अलग करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि पिछले दस वर्षों में पृथ्वी लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से गर्म हुई है, जबकि 1970 से 2015 के बीच यह दर 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक से भी कम थी।
2015 के बाद तेजी से बढ़ी ग्लोबल वार्मिंग
साइंस डेली पर प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वैश्विक तापमान में यह तेज वृद्धि लगभग 2013-2015 के बीच शुरू हुई। पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के विश्लेषण में पांच प्रमुख वैश्विक तापमान डेटासेट में 98 प्रतिशत से अधिक सांख्यिकीय निश्चितता के साथ इस बदलाव की पुष्टि हुई है।
प्राकृतिक प्रभाव हटाकर किया गया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने अल नीनो, ज्वालामुखी विस्फोट और सौर गतिविधियों जैसे अस्थायी प्रभावों को हटाकर पृथ्वी की दीर्घकालिक तापमान वृद्धि का विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार, हाल के वर्षों में दर्ज तापमान वृद्धि 1880 में रिकॉर्डिंग शुरू होने के बाद किसी भी पिछले दशक से अधिक है।
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
अध्ययन के सह-लेखक और अमेरिकी सांख्यिकी विशेषज्ञ ग्रांट फोस्टर ने कहा कि अब 2015 के आसपास से वैश्विक तापमान वृद्धि में मजबूत और सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण तेजी को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है। उनके अनुसार, प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को हटाने से वास्तविक दीर्घकालिक तापमान वृद्धि का संकेत और अधिक साफ दिखाई देता है।
पांचों वैश्विक डेटासेट में मिले समान नतीजे
शोधकर्ताओं ने NASA, NOAA, HadCRUT, Berkeley Earth और ERA5 सहित पांच प्रमुख वैश्विक तापमान डेटासेट का विश्लेषण किया। सभी डेटासेट में तापमान वृद्धि की रफ्तार तेज होने का एक समान पैटर्न देखने को मिला। अध्ययन के प्रमुख लेखक स्टीफ़न रहमस्टोर्फ ने कहा कि 2015 के बाद तापमान वृद्धि में तेजी आने के 98 प्रतिशत से अधिक पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण मिले हैं।
2023 और 2024 रहे सबसे गर्म वर्ष
अध्ययन में अल नीनो और सौर अधिकतम के प्रभावों को समायोजित करने के बाद भी 2023 और 2024 रिकॉर्ड किए गए इतिहास के सबसे गर्म वर्ष बने रहे। सभी आंकड़ों में तापमान वृद्धि की गति 2013-2014 के आसपास बढ़ती दिखाई दी, जबकि 2015 के बाद इसके स्पष्ट प्रमाण सामने आए।
दो अलग-अलग वैज्ञानिक तरीकों से हुई पुष्टि
शोधकर्ताओं ने तापमान वृद्धि की जांच के लिए दो अलग-अलग सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया। दोनों विश्लेषणों ने यही निष्कर्ष दिया कि 1970 के दशक के बाद वैश्विक तापमान बढ़ने की गति अब पहले से अधिक तेज हो गई है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि इस शोध का उद्देश्य केवल तापमान वृद्धि की तेज होती रफ्तार का पता लगाना था, न कि इसके पीछे के सटीक कारणों की पहचान करना। हालांकि, जलवायु मॉडल यह संकेत देते हैं कि ऐसी तेजी वर्तमान जलवायु परिवर्तन के अनुमानित दायरे के अनुरूप है।
2030 से पहले पार हो सकती है 1.5°C की सीमा
स्टीफ़न रहमस्टोर्फ ने चेतावनी दी कि यदि पिछले दस वर्षों जैसी ही तापमान वृद्धि जारी रही, तो 2030 से पहले ही पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा पार हो सकती है। उन्होंने कहा कि पृथ्वी कितनी तेजी से गर्म होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया जीवाश्म ईंधन से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कितनी जल्दी शून्य तक ला पाती है।
कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ी चुनौती
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि पृथ्वी अब 20वीं शताब्दी के अंतिम दशकों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही है। भविष्य में यह रफ्तार कितनी होगी, यह मुख्य रूप से कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी पर निर्भर करेगा।
(एएनआई)
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