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आंतों के बैक्टीरिया से बढ़ा कोलन कैंसर का खतरा

आम आंतों के बैक्टीरिया से बढ़ सकता है कोलन कैंसर का खतरा, वैज्ञानिकों ने खोजा टॉक्सिन का हमला रोकने का तरीका

आम आंतों के बैक्टीरिया से बढ़ सकता है कोलन कैंसर का खतरा वैज्ञानिकों ने खोजा टॉक्सिन का हमला रोकने का तरीका

Gut Bacteria Linked to Higher Colon Cancer Risk |

वॉशिंगटन: वैज्ञानिकों ने एक आम आंतों के बैक्टीरिया और कोलोरेक्टल कैंसर (कोलन कैंसर) के बीच संबंध को समझने में बड़ी सफलता हासिल की है। जॉन्स हॉपकिन्स के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि बैक्टेरॉइड्स फ्रैगिलिस नाम का बैक्टीरिया किस तरह एक टॉक्सिन के जरिए आंतों की सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाता है और ट्यूमर बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है। करीब दो दशकों से वैज्ञानिक इस प्रक्रिया की एक अहम कड़ी को समझने की कोशिश कर रहे थे। 'नेचर' जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने क्लॉडिन-4 नाम के प्रोटीन की पहचान की है, जो बैक्टीरिया के टॉक्सिन के लिए जुड़ने का मुख्य बिंदु यानी रिसेप्टर है। वैज्ञानिकों ने इस खोज के आधार पर एक ऐसा मॉलिक्यूलर डिकॉय भी तैयार किया है, जो टॉक्सिन को आंतों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने से पहले ही रोक सकता है। चूहों पर किए गए प्रयोगों में इसके सकारात्मक नतीजे मिले हैं।

कैसे आंतों का बैक्टीरिया बढ़ा सकता है कैंसर का खतरा?

यह शोध बैक्टेरॉइड्स फ्रैगिलिस नाम के बैक्टीरिया पर केंद्रित है। यह बैक्टीरिया करीब 20 प्रतिशत स्वस्थ लोगों की आंतों में पाया जा सकता है। हालांकि, इसके मौजूद होने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को कैंसर हो जाएगा। इसके कुछ विशेष स्ट्रेन एक शक्तिशाली टॉक्सिन बनाते हैं, जिसे Bacteroides fragilis toxin (BFT) कहा जाता है। यह टॉक्सिन कोलन की सुरक्षात्मक परत को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे लंबे समय तक सूजन बनी रह सकती है और ट्यूमर के विकास को बढ़ावा मिल सकता है। साल 2009 में 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित एक अध्ययन में वरिष्ठ शोधकर्ता सिंथिया सियर्स और उनकी टीम ने दिखाया था कि यह टॉक्सिन कोलन में ट्यूमर के विकास को बढ़ावा दे सकता है। इस शोध ने टॉक्सिन बनाने वाले बैक्टीरिया, पुरानी सूजन और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच संबंध स्थापित करने में मदद की थी।

अब तक वैज्ञानिकों के सामने क्या थी चुनौती?

पिछले अध्ययनों में पता चला था कि BFT टॉक्सिन E-कैडहेरिन नाम के प्रोटीन को नुकसान पहुंचाता है। यह प्रोटीन आसपास की कोशिकाओं को एक साथ जोड़कर रखता है और कोलन की सुरक्षात्मक परत को बनाए रखने में मदद करता है। जब E-कैडहेरिन प्रभावित होता है, तो आंतों की सुरक्षा परत कमजोर हो सकती है। इससे हानिकारक पदार्थों और बैक्टीरिया को आसपास के ऊतकों तक पहुंचने का रास्ता मिल सकता है। हालांकि, वैज्ञानिकों के सामने एक सवाल था कि BFT सीधे E-कैडहेरिन से नहीं जुड़ता, तो आखिर वह उस तक पहुंचता कैसे है? करीब दो दशकों से शोधकर्ता इस प्रक्रिया में शामिल दूसरे अणु की पहचान करने की कोशिश कर रहे थे।

CRISPR तकनीक से मिला गायब कनेक्शन

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने CRISPR नाम की जीन एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इसकी मदद से किसी खास जीन को बंद करके यह समझा जा सकता है कि वह शरीर में किस तरह काम करता है। जॉन्स हॉपकिन्स में सिंथिया सियर्स की लैब में काम करने वाले MD/PhD शोधार्थी मैक्सवेल व्हाइट ने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मैथ्यू वाल्डोर की लैब के साथ मिलकर इस अध्ययन का नेतृत्व किया। शोधकर्ताओं ने कोलन की अंदरूनी परत बनाने वाली कोशिकाओं में अलग-अलग जीन को बंद करके जांच की कि टॉक्सिन को जुड़ने और नुकसान पहुंचाने के लिए कौन-से जीन जरूरी हैं। इस दौरान क्लॉडिन-4 प्रोटीन बनाने वाला जीन सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ। क्लॉडिन-4 आसपास की कोशिकाओं के बीच मजबूत संपर्क बनाने में मदद करता है, जिससे कोशिकाओं के बीच हानिकारक पदार्थों की आवाजाही सीमित रहती है। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो BFT टॉक्सिन कोलन की कोशिकाओं से नहीं जुड़ पाया। इसके बाद वह E-कैडहेरिन पर हमला करने में भी असफल रहा। इससे पता चला कि क्लॉडिन-4 ही वह रिसेप्टर है, जिसकी मदद से टॉक्सिन आंतों की कोशिकाओं तक पहुंचता है।

वैज्ञानिकों को मिली बैक्टीरिया के हमले की नई रणनीति

क्लॉडिन-4 की पहचान ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया। शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि टॉक्सिन किसी ऐसे प्रोटीन से जुड़ेगा, जो कोशिकाओं के भीतर संकेत भेजने का काम करता है। लेकिन क्लॉडिन-4 का मुख्य काम कोशिकाओं के बीच भौतिक संपर्क बनाए रखना है। इस खोज से BFT के काम करने का एक अलग तरीका सामने आया। यह टॉक्सिन प्रोटीएज नाम के एंजाइम समूह से संबंधित है, जो दूसरे प्रोटीन को काटने का काम करते हैं। आमतौर पर ऐसे एंजाइम सीधे अपने लक्ष्य पर हमला करते हैं, लेकिन BFT को E-कैडहेरिन तक पहुंचने के लिए पहले क्लॉडिन-4 से जुड़ना पड़ता है। इस संबंध की पुष्टि के लिए जॉन्स हॉपकिन्स के शोधकर्ताओं ने बार्सिलोना स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिकों एफ. जेवियर गोमिस-रूथ और उलरिच एकहार्ड के साथ मिलकर काम किया। विशेष तकनीकों से किए गए प्रयोगों में पाया गया कि BFT और क्लॉडिन-4 मजबूती से एक-दूसरे से जुड़कर कॉम्प्लेक्स बनाते हैं। इससे दोनों के बीच सीधे जुड़ाव का प्रमाण मिला।

मॉलिक्यूलर डिकॉय से टॉक्सिन को रोकने में मिली सफलता

क्लॉडिन-4 की पहचान होने के बाद वैज्ञानिकों ने टॉक्सिन को रोकने का एक नया तरीका विकसित किया। उन्होंने एक घुलनशील प्रोटीन तैयार किया, जिसमें क्लॉडिन-4 के कुछ हिस्सों के सीक्वेंस शामिल थे। इसे मॉलिक्यूलर डिकॉय नाम दिया गया। इसका उद्देश्य टॉक्सिन को असली कोलन कोशिकाओं तक पहुंचने से पहले ही अपनी ओर आकर्षित करना था। इस रणनीति को चूहों पर परखने के लिए शोधकर्ताओं ने हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मिन डोंग की लैब के साथ काम किया। प्रयोग में पाया गया कि BFT टॉक्सिन कोलन कोशिकाओं के क्लॉडिन-4 रिसेप्टर से जुड़ने के बजाय डिकॉय प्रोटीन से जुड़ गया। इस तरह डिकॉय ने टॉक्सिन को रोककर चूहों को उससे होने वाले नुकसान से सफलतापूर्वक बचाया। शोधकर्ता मैक्सवेल व्हाइट के मुताबिक, इस तरीके को छोटे अणुओं या दूसरे बायोलॉजिकल उपचारों के जरिए भी विकसित किया जा सकता है। टीम अब ऐसे विकल्पों पर काम कर रही है, जो टॉक्सिन को रोकने में अधिक प्रभावी साबित हो सकें।

क्या इस खोज से इंसानों में कोलन कैंसर को रोका जा सकेगा?

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह खोज भविष्य में कोलोरेक्टल कैंसर से जुड़े बैक्टीरियल नुकसान को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। हालांकि, अभी इसे इंसानों के इलाज के रूप में इस्तेमाल करने से पहले कई परीक्षण करने होंगे। वैज्ञानिकों ने अभी तक BFT और क्लॉडिन-4 के बीच जुड़ाव की सटीक त्रि-आयामी संरचना का पता नहीं लगाया है। यहां तक कि अल्फाफोल्ड जैसे उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल भी इस प्रक्रिया को पूरी तरह समझने में सफल नहीं हुए हैं। इस संरचना को समझने से ऐसे अधिक प्रभावी अणु तैयार करने में मदद मिल सकती है, जो टॉक्सिन को क्लॉडिन-4 से जुड़ने से रोक सकें। इसके अलावा, यह भी जांचना बाकी है कि मॉलिक्यूलर डिकॉय इंसानों में कितना सुरक्षित और प्रभावी होगा। चूहों पर किए गए प्रयोगों में टिशू को नुकसान से बचाने के नतीजे मिले हैं, लेकिन इससे यह साबित नहीं हुआ है कि यह तरीका इंसानों में कोलोरेक्टल कैंसर को रोक सकता है। जॉन्स हॉपकिन्स की वरिष्ठ शोधकर्ता सिंथिया सियर्स के मुताबिक, बैक्टीरियल टॉक्सिन के काम करने के तरीके को समझने से डायरिया, कोलोरेक्टल कैंसर और ब्लडस्ट्रीम इंफेक्शन जैसी बीमारियों की पहचान और इलाज के नए रास्ते खुल सकते हैं। फिलहाल यह अध्ययन कैंसर से जुड़े बैक्टीरियल नुकसान को शुरुआती स्तर पर रोकने की दिशा में एक अहम वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है।

(ANI)

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