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ऑटिज्म से जूझ रहे बेटे के लिए मां खुद बनी 'स्पेशल टीचर'

एक मां की ममता और संघर्ष की कहानी अक्सर प्रेरणा देती है, लेकिन भोपाल के अयोध्या नगर की रहने वाली अनिमा गौतम की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

ऑटिज्म से जूझ रहे बेटे के लिए मां खुद बनी स्पेशल टीचर

A mother becomes a 'special teacher' for her son who suffers from autism |

भोपाल। एक मां की ममता और संघर्ष की कहानी अक्सर प्रेरणा देती है, लेकिन भोपाल के अयोध्या नगर की रहने वाली अनिमा गौतम की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। दो बेटियों के बाद जब बेटे अविराज का जन्म हुआ, तो परिवार की खुशियां सातवें आसमान पर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। आज 8 साल का अविराज 'ऑटिज्म' नामक स्थिति से जूझ रहा है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन भर रहने वाली एक मानसिक अवस्था है।

शुरुआती एक साल तक सामान्य था बच्चा

अनिमा बताती हैं कि शुरुआती एक साल तक सब सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे अविराज का व्यवहार बदलने लगा। वह रात-रात भर रोता, आवाज देने पर पलटकर नहीं देखता और खुद की ही दुनिया में खोया रहता। जब डॉक्टरों ने कहा कि बच्चा कभी नहीं बोल पाएगा, तो अनिमा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे भावुक होकर बताती हैं कि, "कई बार वह गुस्से में मुझे नाखूनों से नोच लेता है, हाथ नीले पड़ जाते हैं, खून बहने लगता है। लेकिन मैं जानती हूं कि वह जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा। उसे दर्द या खतरे का अहसास ही नहीं होता।" एक बार अविराज ने जलते हुए तवे पर हाथ रख दिया, लेकिन उसे तुरंत जलन महसूस नहीं हुई। एक अन्य हादसे में उसने हारपिक पी लिया था, जिसे अनिमा ने मौत के मुंह से खींचकर बचाया।

थेरेपी से आने लगा बदलाव

एक वक्त ऐसा भी आया जब अनिमा के मन में आत्महत्या के विचार आने लगे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लड़ने का फैसला किया। जब उन्हें पता चला कि साधारण परवरिश से अविराज को ठीक नहीं किया जा सकता, तब उन्होंने भोपाल के 'दिग्दर्शिका रिहैबिलिटेशन सेंटर' से विशेष बच्चों को पढ़ाने का कोर्स करने का निर्णय लिया। अब वे खुद एक Special Educator बन चुकी हैं और स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं। वे जिन तकनीक को स्कूल में सीखती हैं, उन्हें घर पर अविराज पर लागू करती हैं। अनिमा ने हार नहीं मानी और खेल-खेल में अविराज को खुद को बचाना सिखाया। उन्होंने बताया कि, "पहले उसकी ओर फुटबॉल फेंकने पर वह पलक भी नहीं झपकाता था। उन्होंने उसे'हटो' कहना सिखाया। कई बार के अभ्यास के बाद वह अब गेंद आने पर खुद को बचा लेता है।"

पीड़िता का आरोप: धरातल पर कारगर साबित नहीं हो रही 'निरामय योजना' जैसी कोशिशें

अनिमा का कहना है कि सरकार की 'निरामय योजना' जैसी कोशिशें कागजों पर तो हैं, लेकिन धरातल पर ऑटिज्म से जूझ रहे परिवारों के लिए खास कारगर साबित नहीं हो रही हैं। उनका मानना है कि ऐसे बच्चों को सहानुभूति की नहीं, बल्कि सही थेरेपी और समझ की जरूरत है। अनिमा की कहानी समाज के लिए एक बड़ा सबक है कि धैर्य और सही जानकारी से किसी भी बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।

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