इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भोजपुरी अभिनेत्री आकांक्षा दुबे की मौत के मामले में सीबीआई जांच की मांग के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करने का निर्देश दिया है।
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भोजपुरी अभिनेत्री आकांक्षा दुबे की मौत की निष्पक्ष और तटस्थ जांच तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जांच की मांग वाली याचिका दायर करने का आदेश दिया है।
परिस्थितियां आत्महत्या के बजाय हत्या की ओर कर रही इशारा
न्यायालय ने पाया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दायर चार्जशीट और इसे चुनौती देने वाली किसी भी विरोध याचिका के अभाव में इस घटना को हत्या का मामला बताना निराधार है। न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने वाराणसी के सारनाथ पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले के संबंध में अभिनेत्री की मां मधु दुबे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने मृतक की तस्वीरों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उनमें दिखाई देने वाली परिस्थितियां आत्महत्या के बजाय हत्या की ओर इशारा करती हैं।
अपराध में शामिल एक व्यक्ति के डीएनए का हुआ मिलान
तिवारी ने बताया कि मृतक का बायां पैर जमीन पर था और वह बिस्तर पर बैठी हुई थी। उन्होंने उसकी कलाई पर लगी चोटों की ओर भी इशारा करते हुए दावा किया कि ये परिस्थितियां उसकी मृत्यु के तरीके पर सवाल उठाती हैं। वकील ने आगे बताया कि मृतक के शरीर और कपड़ों से शुक्राणु बरामद किए गए थे और फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की डीएनए रिपोर्ट में कथित तौर पर अपराध में शामिल एक व्यक्ति के डीएनए का मिलान हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) ने जानबूझकर उच्च न्यायालय में दायर जवाबी हलफनामे में डीएनए मिलान की जानकारी को छुपाया था, यह दावा करते हुए कि इससे पुलिस की मिलीभगत का संकेत मिलता है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट मृत्यु के कारण को स्थापित करने के लिए निर्णायक सबूत नहीं
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में दर्ज तथ्य मृतक की मां से जबरदस्ती लिए गए थे। पूजा पाल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए, तिवारी ने तर्क दिया कि एक अदालत निष्पक्ष जांच के लिए मामले को सीबीआई को सौंप सकती है, भले ही आरोप पत्र दाखिल किया गया हो और सक्षम न्यायालय ने मामले का संज्ञान लिया हो। उन्होंने आगे तर्क दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मृत्यु के कारण को स्थापित करने के लिए निर्णायक सबूत नहीं है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आरोप पत्र दाखिल
इस याचिका का विरोध करते हुए, दूसरे पक्ष के वकील ने अदालत को सूचित किया कि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया है, जो आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है, और सक्षम मजिस्ट्रेट ने इसका संज्ञान ले लिया है। इसके बाद पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि क्या जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट की पुनर्परीक्षा हेतु कोई आवेदन दाखिल किया गया था या क्या सर्वोच्च न्यायालय के भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार आरोप पत्र को चुनौती देते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष कोई विरोध याचिका दाखिल की गई थी।
चुनौती देने वाली किसी कानूनी विरोध याचिका के अभाव में, यह तर्क निराधार
याचिकाकर्ता के वकील ने स्वीकार किया कि ऐसा कोई आवेदन या विरोध याचिका दाखिल नहीं की गई थी। अदालत ने पाया कि आईपीसी की धारा 306 के तहत दायर आरोपपत्र और इसे चुनौती देने वाली किसी कानूनी विरोध याचिका के अभाव में, यह तर्क निराधार है कि यह घटना हत्या का मामला है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतक का शव न होने के कारण घटना या मृत्यु के तरीके की पुन: जांच नहीं की जा सकती। उच्च न्यायालय ने याचिका का निपटारा करते हुए उसे रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया।
(इनपुट: ANI)
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