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रायबरेली जेल में बने दीपोत्सव के दीये

अयोध्या दीपोत्सव के लिए रायबरेली जेल में तैयार हो रहे दीये, बंदियों के हाथों को मिला नया हुनर और रोजगार

दीपावली पर इस बार अयोध्या का सरयू तट रायबरेली जिला कारागार के बंदियों के हाथों से तैयार दीयों से भी रोशन होगा।

अयोध्या दीपोत्सव के लिए रायबरेली जेल में तैयार हो रहे दीये बंदियों के हाथों को मिला नया हुनर और रोजगार

Ayodhya Deepotsav: Diyas Made in Rae Bareli Jail, Inmates Gain Skills and Employment |

रायबरेली {उत्तर प्रदेश}: दीपावली पर इस बार अयोध्या का सरयू तट रायबरेली जिला कारागार के बंदियों के हाथों से तैयार दीयों से भी रोशन होगा। जेल में इन दिनों दीपावली की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, जहां बंदी मिट्टी के हजारों दीये, बर्तन और खिलौने तैयार कर रहे हैं। इनमें से 10 हजार से अधिक दीये अयोध्या के भव्य दीपोत्सव में उपयोग के लिए विशेष रूप से भेजे जा रहे हैं।

महिला और पुरुष बंदी मिलकर दे रहे हैं आकार

जिला कारागार प्रशासन की इस अनूठी पहल का मुख्य उद्देश्य बंदियों को हुनरमंद बनाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना है। पुरुष बंदियों के साथ महिला बंदी भी इस रचनात्मक कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। महिलाएं जहां घास से आकर्षक डलियां, सुंदर टोकरियां और अन्य सजावटी सामान बना रही हैं, वहीं पुरुष बंदी मिट्टी को तराशकर विभिन्न उत्पाद तैयार करने के बाद उन पर रंग-रोगन कर रहे हैं, जिससे वे बेहद मनमोहक रूप ले रहे हैं।

प्रशासन उपलब्ध करा रहा संसाधन

बंदियों को काम के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। दीये और बर्तन बनाने के वास्ते उच्च गुणवत्ता वाली मिट्टी बाहर से मंगाई जा रही है। डीएम सरनीत कौर ब्रोका, जेल अधीक्षक प्रभात सिंह और जेलर हिमांशु रौतेला बंदियों को लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

पुनर्वास की दिशा में सराहनीय कदम

जेल अधीक्षक प्रभात सिंह ने बताया कि इस रचनात्मक पहल से बंदियों को उनकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक मिलेगा और सजा पूरी होने के बाद जब वे जेल से बाहर जाएंगे, तो उन्हें रोजगार की एक मजबूत दिशा मिल सकेगी।

जेल के बाहर बनी विशेष बिक्री दुकान

तैयार उत्पादों की सुगम बिक्री के लिए जिला कारागार के बाहर एक विशेष दुकान भी संचालित की जा रही है। यहां मिट्टी के दीये, बर्तन, खिलौने और सजावटी सामान बिक्री के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे आम नागरिक भी इन्हें आसानी से खरीद सकते हैं। इन उत्पादों की बिक्री से होने वाली आय में से एक निर्धारित हिस्सा बंदियों को पारिश्रमिक के रूप में प्रदान किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बंदियों को हुनर और रोजगार से जोड़ना उनके सामाजिक पुनर्वास की दिशा में एक बेहद सराहनीय कदम है।

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