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CM ममता बनर्जी ने कहा कि संविधान और हिंदू-मुस्लिम

संविधान और हिंदू-मुस्लिम एकता विरोधी ताकतें बर्दाश्त नहीं : सीएम ममता बनर्जी

Madhya Pradesh : मध्य प्रदेश के धार जिले के बाघिन गाँव है। यहां कपड़ा जैसे ही नदी को छूता है, रंग जीवंत हो उठते हैं।

संविधान और हिंदू-मुस्लिम एकता विरोधी ताकतें बर्दाश्त नहीं  सीएम ममता बनर्जी

संविधान और हिंदू-मुस्लिम एकता विरोधी ताकतें बर्दाश्त नहीं : सीएम ममता बनर्जी |

Madhya Pradesh : मध्य प्रदेश के धार जिले के बाघिन गाँव है। यहां कपड़ा जैसे ही नदी को छूता है, रंग जीवंत हो उठते हैं। यही प्राकृतिक जादू बाघ प्रिंट को वैश्विक पहचान दिलाता है। पौराणिक कथाएं हमें बताती हैं कि नदियाँ पाप धो देती हैं। लेकिन धार जिले के छोटे से गाँव बाघिन में एक नदी कुछ अलग करती है। वह रंग देती है। जैसे ही कपड़ा उसकी कैल्शियम और जिंक से भरपूर जल को छूता है, रंग और चमकीले, और दमदार हो जाते हैं। कपड़ा नरम होता है, आकृतियां निखरती हैं और रंग मानो मुस्कुराने लगते हैं।

यह वही प्रसिद्ध बाघिन नदी है, जिसके पानी से भारत की सबसे मशहूर जैविक वस्त्र कलाओं में से एक बाघ या बाघिन प्रिंट का जन्म होता है। एक समय में मानचित्र पर छोटा-सा धब्बा रहा बाघिन गाँव आज इसी नदी और इसी कला के कारण दुनिया भर में जाना जाता है। क्या है बाघिन प्रिंट? यह एक लंबी, परिश्रमी और पूरी तरह जैविक प्रक्रिया है। इसके हर चरण में धोने, रंगने, छपाई से लेकर अंतिम निखार तक बाघिन नदी के पानी पर निर्भर करता है। इसके खनिज जल के बिना रंगों का व्यवहार वैसा नहीं होता।राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार मोहम्मद बिलाल खत्री का परिवार इससे तीसरी पीढ़ी जुड़ी हुई है। वे कहते हैं, “बाघिन नदी सदियों से यहाँ बह रही है। इसके पानी में कैल्शियम और जिंक प्रचुर मात्रा में है। रंग जैसे ही इसे छूते हैं, तुरंत खिल उठते हैं।”संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन के दौरान उन्हें बताया गया था कि बाघिन का पानी “सबसे स्वच्छ” है। 

क्या है प्राकृतिक रंगों का विज्ञान?

हर रंग प्राकृतिक, स्थानीय स्रोतों से तैयार किया जाता है। बिलाल बताते हैं। लाल रंग लाल फिटकरी से आता है, वहीं, काला रंग आयरन रस्ट (लौह क्षार) से से आता है। इसके साथ पीला रंग हरड़ से आता है। इसके साथ चिपकने वाला माध्यम इमली के बीज का पाउडर से आता है। रंग में चमक धवड़ी फूल से आता है। वहीं, मरून रंग मजीठ की जड़ से आता है और यहाँ तक कि बकरी का मैंगनीज़ भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। बिलाल कहते हैं, यह पूरा काम एक अनुष्ठान की तरह है। सटीक, नियमित और धैर्यपूर्ण।

इसमें यह प्रक्रिया अपनाई जाती है

पहले कपड़ा काटकर बाघिन नदी के पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद अगले दिन इसे बकरी मैंगनीज़, अरंडी के तेल और संछोरा नमक के मिश्रण से कूटा जाता है और पैरों तले दबाया जाता है। यह तीन दिन चलता है। इसके बाद फिर नदी में दोबारा धोया जाता है, हरड़ से उपचारित किया जाता है और सुखाया जाता है। तब लकड़ी के ब्लॉकों से छपाई होती है (इमली के बीज के पेस्ट से) छपा कपड़ा 8–10 दिन विश्राम में रखा जाता है।फिर तेज बहते हुए नदी जल के विरुद्ध धोया जाता है ताकि खनिज, फिटकरी और आयरन रस्ट हट जाएं। इसके बाद धवड़ी फूल और मजीठ की जड़ से बने काढ़े में उबालने की प्रक्रिया (फर्नेस) होती है।फिर “तपाई” प्रक्रिया, बार-बार धोना और सुखाना ताकि कपड़े में प्राकृतिक उजास आ सके।

अंत में तैयार कपड़ा, गहरा काला, चटक मरून, धूप-सा पीला - बाघ गुफाओं, ताजमहल, लाल किले और अन्य स्मारकों के रूपांकनों को संजोए हुए होता है। बाघिन प्रिंट की कहानी, खत्री समुदाय की कहानी है। बिलाल कहते हैं, खत्री समुदाय सिंध (पाकिस्तान) से राजस्थान और फिर मनावर के बाघिन नदी किनारे आकर बसा। पूर्वज 1962 में यहाँ आए और यहीं रह गए। दादा इस्माइल सुलेमान खत्री और पिता मोहम्मद यूसुफ खत्री ने बाघ प्रिंट को दुनिया तक पहुँचाया।

मनावर में आदिवासी दुल्हनों के लिए लुगड़े और लहंगे बनाने से लेकर आज 24 से अधिक देशों में कपड़े निर्यात होते हैं। खत्री परिवार ने इस कला की पहचान गढ़ी है।बिलाल पाँच देशों में यह कला दिखा चुके हैं और उनके पिता 24 देशों में। अंत में कहते हैं: “यह कला आज भी वहीं से शुरू होती है, नदी। मिट्टी। वे हाथ जो छापते हैं। और वह धैर्य जो इन तीनों का सम्मान करता है।

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