बैतूल के कुकरू क्षेत्र को कॉफी उत्पादन के लिए अनुकूल पाया गया है। प्रशासन अब कॉफी की खेती का विस्तार करने की तैयारी में है। किसानों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दिया जाएगा।
बैतूल: बैतूल के कुकरू की पहचान अब सिर्फ अपनी खूबसूरत वादियों के लिए नहीं, बल्कि कॉफी उत्पादन के नए मॉडल के तौर पर भी बनने जा रही है। सेंट्रल कॉफी बोर्ड के विशेषज्ञों की फील्ड विजिट में कुकरू का क्षेत्र कॉफी उत्पादन के लिए अनुकूल पाया गया है। इसके बाद कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे ने कॉफी उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। खास बात ये है कि कुकरू में कॉफी की कहानी कोई नई नहीं है। साल 1944 में ब्रिटिश महिला फ्लोरेंस हेड्रेंक्स ने यहां अरेबीका प्रजाति की कॉफी लगाई थी, जो करीब 44 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली थी। अब कॉफी की खेती को विस्तार देने की तैयारी है, जिसका सीधा फायदा स्थानीय किसानों और ग्रामीणों को मिल सकता है।
कॉफी की खेती से बढ़ेगी किसानों की आय
किसानों को उन्नत तकनीक का प्रशिक्षण, एक्सपोजर विजिट और तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाएगा, ताकि पारंपरिक खेती के साथ कॉफी उनकी नई आय का जरिया बन सके। कॉफी उत्पादन बढ़ने के साथ स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। वन समितियों और ग्रामीण समूहों को भी आजीविका गतिविधियों से जोड़ने की योजना है। वहीं, कुकरू की कॉफी को प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन से जोड़ने की तैयारी इस योजना को और खास बनाती है। खेती के साथ प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, बिक्री और कॉफी टूरिज्म विकसित हुआ तो इसका फायदा पूरे क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। यानी लक्ष्य सिर्फ कुकरू में कॉफी उगाना नहीं, बल्कि कॉफी के जरिए किसान की आय, गांव का रोजगार और पर्यटन तीनों को नई रफ्तार देना है।
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