विधानसभा के बजट सत्र के दौरान नर्सिंग ऑफिसर भर्ती 2019 को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने एक बड़ी जानकारी साझा की है।
भोपाल। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान नर्सिंग ऑफिसर भर्ती 2019 को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने एक बड़ी जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि 12 जून 2023 को भोपाल स्थित सतपुड़ा भवन की तीसरी, चौथी, पांचवीं और छठी मंजिल पर भीषण आग लगी थी। इस अग्निकांड में स्वास्थ्य विभाग की नर्सिंग शाखा से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज, फाइलें और रिकॉर्ड जलकर खाक हो गए हैं। इस वजह से पुरानी भर्तियों की जांच और जानकारी उपलब्ध कराने में सरकार को कठिनाई हो रही है।
क्या है नर्सिंग भर्ती और विवाद
स्वास्थ्य विभाग ने 8 फरवरी 2019 को नर्सिंग ऑफिसर और नर्सिंग ट्यूटर के पदों पर सीधी भर्ती निकाली थी। भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव किया गया था। पहले योग्यता 10वीं पास और 18 माह का प्रशिक्षण थी, जिसे बदलकर 12वीं (PCB) और 24 माह का प्रशिक्षण कर दिया गया। उस समय नियमों में बदलाव किया गया जिससे कई अभ्यर्थी अपात्र हो गए। इसके साथ कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स (CHO) की ट्रेनिंग वालों को नर्सिंग ऑफिसर पद पर भर्ती के लिए पात्र माना गया, जिस पर विवाद हुआ।
कोर्ट में केस हुआ, सदन में उठे सवाल
नियमों में बदलाव और विसंगतियों के चलते लगभग 4 हजार अभ्यर्थी हाईकोर्ट पहुँच गए और भर्ती प्रक्रिया को चुनौती दी। करीब एक हजार पदों पर हुई इस भर्ती से संबंधित सभी मूल दस्तावेज सतपुड़ा भवन की आग में नष्ट हो चुके हैं। बालाघाट की परसवाड़ा सीट से कांग्रेस विधायक मधु भगत ने सदन में पूछा था कि फरवरी 2019 की भर्ती में कितने ऐसे नर्सिंग ऑफिसर चुने गए जिन्होंने CHO प्रशिक्षण लिया था? यदि बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ, तो संबंधित अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई?
सरकार का विरोधाभास भी आया सामने, पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह भी उल्लेख है कि आग लगने के तुरंत बाद तत्कालीन सरकार और विभाग ने दावा किया था कि महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित हैं क्योंकि वे आयुक्त कार्यालय में रहते हैं। हालांकि, अब सदन में फाइलों के जलने की बात कही जा रही है, जो कई सवाल खड़े करती है। फाइलों के जलने से सेवा पुस्तिकाएं, शिकायतें और स्थापना शाखा से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा प्रभावित हुए हैं, जिससे पुरानी नियुक्तियों की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
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