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कॉलेजों में अनिवार्य HIV टेस्टिंग और 7000 छात्रों

कॉलेजों में अनिवार्य HIV टेस्टिंग और 7000 छात्रों के संक्रमित होने का दावा फर्जी, KSAPS ने बताई पूरी सच्चाई

कर्नाटक में कॉलेज छात्रों की HIV जांच अनिवार्य होने की खबरों को KSAPS ने फर्जी बताया। जानिए 7,000 छात्रों के HIV पॉजिटिव होने के दावे और सरकारी आंकड़ों की पूरी सच्चाई।

कॉलेजों में अनिवार्य hiv टेस्टिंग और 7000 छात्रों के संक्रमित होने का दावा फर्जी ksaps ने बताई पूरी सच्चाई

KSAPS Project Director Padma Basavanthappa |

बेंगलुरु (कर्नाटक)। कर्नाटक में कॉलेज के छात्रों के लिए एचआईवी (HIV) जांच अनिवार्य किए जाने और हजारों छात्रों के संक्रमित मिलने की उड़ी खबरों पर अब प्रशासनिक स्तर पर विराम लगा दिया गया है। कर्नाटक स्टेट एड्स प्रिवेंशन सोसाइटी (KSAPS) ने इन सभी वायरल दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार बताया है। सोसाइटी ने स्पष्ट किया है कि कानूनन किसी भी व्यक्ति पर एचआईवी टेस्ट के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता है।

क्या है पूरा मामला और वायरल खबरों की सच्चाई?

हाल ही में सोशल मीडिया, कुछ समाचार माध्यमों और अखबारों में यह दावा किया गया था कि कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए एचआईवी टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही यह अफवाह भी तेजी से फैली कि राज्य में हाल ही में 7,000 छात्र एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं। इन सनसनीखेज दावों के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता का माहौल बन गया था।

पद्मा बसवंथप्पा ने आधिकारिक बयान में कहा कि सोशल मीडिया, समाचार माध्यमों और अखबारों में एचआईवी की अनिवार्य जांच को लेकर गलत संदेश फैलाए जा रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक स्टेट एड्स प्रिवेंशन सोसाइटी (KSAPS) की प्रोजेक्ट डायरेक्टर पद्मा बसवंथप्पा ने एक आधिकारिक वीडियो संदेश जारी कर इन सभी दावों की पोल खोली। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सोशल मीडिया और खबरों में चल रहे संदेश पूरी तरह से भ्रामक और मनगढ़ंत हैं।

राज्य में एचआईवी के आधिकारिक आंकड़े क्या हैं?

पद्मा बसवंथप्पा ने राज्य में एचआईवी संक्रमण की वास्तविक स्थिति और सरकारी आंकड़ों का पूरा ब्योरा साझा किया। उन्होंने बताया कि 'संकलन' (Sankalak) पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में एचआईवी की कुल व्यापकता दर 2,91,341 है। इस कुल आंकड़े को समझाते हुए उन्होंने कहा, "इनमें से 2,03,000 मरीज हमारे साथ पंजीकृत हैं और वे नियमित दवा (मेडिकेशन) ले रहे हैं। कुछ आंकड़े उन लोगों के हैं जिनका निधन हो चुका है, और कुछ का इलाज निजी सेक्टर में चल रहा है। इस तरह डेटा में कुल 56,000 का अंतर (गैप) दिखाई देता है।"

आंकड़ों के इस अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने आगे कहा कि इस गैप में से 18,000 लोग प्राइवेट सेक्टर के अंतर्गत आते हैं, जिनकी सूची हमारे पास मौजूद है। बाकी बचे हुए 38,000 ऐसे लोग हैं जो एचआईवी पॉजिटिव तो हैं लेकिन अभी तक चिन्हित नहीं हो पाए हैं। इन लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी नहीं है और वे अनजाने में यौन गतिविधियों के जरिए संक्रमण को आगे बढ़ा सकते हैं।

डेटिंग ऐप्स और वर्चुअल माध्यमों से ट्रेसिंग में आ रही चुनौती

प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने आधुनिक जीवनशैली में आए बदलावों और नई चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि आज के दौर में डेटिंग ऐप्स और लोगों से मिलने के वर्चुअल माध्यमों के कारण स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों (High-risk individuals) को ट्रेस करना बेहद कठिन हो गया है।

उन्होंने बताया, "वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर मिलने वाले लोग अक्सर एक-दूसरे के पते और पहचान से अनजान होते हैं, जिससे हम उन्हें ट्रैक करने में असमर्थ हैं। यही वजह है कि लोगों में जागरूकता फैलाना ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे वे खुद अपना जोखिम आकलन (Risk Assessment) कर सकें और हमारे सेंटर्स से जुड़ सकें।"

तकनीक का सहारा: 'BreakFree' ऐप और QR कोड की शुरुआत

इस समस्या से निपटने के लिए केएसएपीएस (KSAPS) ने तकनीक आधारित एक नया जागरूकता अभियान शुरू किया है। इसके तहत क्यूआर कोड और 'ब्रेकफ्री' (BreakFree) मोबाइल एप्लीकेशन को लॉन्च किया गया है। पद्मा बसवंथप्पा ने इस प्रक्रिया को समझाते हुए कहा, "हम ब्रेकफ्री ऐप के क्यूआर कोड के माध्यम से जागरूकता फैला रहे हैं। इस कोड को स्कैन करके उपयोगकर्ता जोखिम मूल्यांकन से जुड़े कुछ सवालों के जवाब देते हैं। यदि कोई व्यक्ति जोखिम में पाया जाता है, तो वह ऐप के जरिए सीधे किसी काउंसलर से जुड़ सकता है या अपने नजदीकी टेस्टिंग सेंटर का पता लगा सकता है। देश भर के सभी सेंटर्स की सूची इस पर उपलब्ध है।"

कानूनी प्रावधान: सरकार नहीं कर सकती जबरदस्ती

सरकार की ओर से यह साफ कर दिया गया है कि किसी भी नागरिक को जांच के लिए विवश नहीं किया जा सकता है। कानूनी ढांचे का हवाला देते हुए प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने कहा, "अपने जोखिम का आकलन करने के बाद, यदि किसी को भी लगता है कि वे खतरे में हैं, तो उन्हें एचआईवी की पहचान और आगे के इलाज के लिए हमारे केंद्रों पर खुद आना चाहिए। हम कहीं भी अनिवार्य परीक्षण के लिए नहीं कह रहे हैं, क्योंकि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है। 'एड्स रोकथाम और नियंत्रण अधिनियम, 2017' के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को एचआईवी परीक्षण कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।"
​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
 
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