BHU में 35 वर्षीय रामू के विशाल जबड़े के ट्यूमर की 8 घंटे की जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। डॉक्टरों ने पैर की फिबुला हड्डी से जबड़े का पुनर्निर्माण कर उनका चेहरा लगभग सामान्य कर दिया।
वाराणसी: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के रहने वाले 35 वर्षीय रामू बीते कई वर्षों से एमेलोब्लास्टोमा बीमारी से ग्रसित थे। उनके निचले जबड़े में हल्की सूजन से शुरू हुआ यह रोग धीरे-धीरे बढ़कर लगभग पूरे जबड़े में फैले एक विशाल ट्यूमर में तब्दील हो गया, जिससे उनके चेहरे की बनावट पूरी तरह बदल गई।
अंत में पहुंचे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
एक वाहन कंपनी में लोगों से बातचीत करके अपनी आजीविका चलाने वाले रामू के लिए शारीरिक पीड़ा तो भारी थी ही, लेकिन भावनात्मक पीड़ा तो विनाशकारी थी ही। लगातार सामाजिक चिंता और दुनिया का सामना करने की बढ़ती अनिच्छा से ग्रस्त रामू अंतर्मुखी हो गए थे। उन्होंने वर्षों तक कई क्लीनिकों और अस्पतालों में मदद मांगी, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। जब लगभग सारी उम्मीदें खत्म हो गईं, तब रामू को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के दंत विज्ञान संकाय में भेजा गया। जहां वे मुंह और जबड़े की शल्य चिकित्सा (ओएमएफएस) के विशेषज्ञ प्रोफेसर अखिलेश कुमार सिंह के बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में पहुंचे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए गठित की गई टीम
गहन जांच के बाद, चिकित्सा दल ने मामले की गंभीरता को समझा। ट्यूमर ने उनके जबड़े (मैंडिबल) के एक महत्वपूर्ण हिस्से को तेजी से नष्ट कर दिया था, जिसके लिए एक व्यापक और जीवनरक्षक सर्जरी की आवश्यकता थी। जटिलता को समझते हुए, प्रोफेसर सिंह ने इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए दंत शल्य चिकित्सकों और एनेस्थेसियोलॉजिस्टों की एक बहु-विषयक विशेषज्ञ टीम का गठन किया। ओएमएफएस शल्य चिकित्सा टीम का नेतृत्व प्रोफेसर अखिलेश कुमार सिंह ने किया, जिसमें प्रोफेसर नरेश कुमार शर्मा, वरिष्ठ निवासी डॉ. श्वेता और कनिष्ठ निवासी डॉ. आशुतोष आर्य, डॉ. अंशु और डॉ. पूनम यादव शामिल थीं।
ओएमएफएस ऑपरेशन थिएटर में 8 घंटे चली सर्जरी प्रक्रिया
एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व प्रोफेसर यशपाल सिंह ने किया, जिसमें वरिष्ठ निवासी डॉ. तन्वी आनंद और कनिष्ठ निवासी डॉ. दीपक ने पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थिरता सुनिश्चित की। बीएचयू ट्रॉमा सेंटर के ओएमएफएस ऑपरेशन थिएटर में आठ घंटे की एक जटिल सर्जरी प्रक्रिया शुरू हुई। इस रणनीति में दो प्रमुख पहलू शामिल थे। ट्यूमर को निकालना और उसका पुनर्निर्माण करना, सबसे पहले शल्य चिकित्सा दल ने सावधानीपूर्वक जबड़े के उस पूरे हिस्से को निकाला जो ट्यूमर से प्रभावित था, जिससे रोग पूरी तरह से खत्म हो गया। इसके बाद आधुनिक चिकित्सा का चमत्कार सामने आया, माइक्रोवैस्कुलर फ्री फिबुला फ्लैप पुनर्निर्माण।
ऑपरेशन के दौरान निकाली गईं रक्त वाहिकाएं
दल ने रामू के दाहिने पैर से फिबुला हड्डी का एक स्वस्थ हिस्सा, साथ ही उससे जुड़ी रक्त वाहिकाएं भी निकालीं। उच्च आवर्धन के तहत उच्च परिशुद्धता वाली माइक्रोवैस्कुलर शल्य चिकित्सा तकनीकों का उपयोग करते हुए, सर्जनों ने पैर की हड्डी की छोटी वाहिकाओं को रामू की गर्दन की रक्त वाहिकाओं से जोड़कर रक्त की आपूर्ति को पुनः स्थापित किया। इस महत्वपूर्ण कदम ने यह सुनिश्चित किया कि नए आकार के जबड़े को पर्याप्त रक्त संचार मिले ताकि वह ठीक हो सके और सफलतापूर्वक जुड़ सके।
8 घंटे की सर्जरी पूरी तरह रही सफल
आखिर में 8 घंटे तक चली सर्जरी पूरी तरह सफल रही। जब रामू होश में आया, तो लगभग एक दशक से उसके ऊपर पड़ा भारी बोझ हट गया था। उसके चेहरे की समरूपता और आकृति लगभग सामान्य हो गई थी। फिबुला हड्डी को सावधानीपूर्वक निकालने के कारण रामू को पैरों में कोई खास कमजोरी महसूस नहीं हुई। वह जल्द ही सामान्य रूप से चलने और अपनी दिनचर्या फिर से शुरू करने में सक्षम हो गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक चिंता का साया छंट गया। उसकी जगह एक उज्ज्वल मुस्कान और आत्मविश्वास की एक नई भावना ने ले ली।
एक बार फिर वापस मिला पुराना जीवन
दंत विज्ञान संकाय के डीन और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एच.सी. बरनवाल ने इतनी चुनौतीपूर्ण और उन्नत चिकित्सा उपलब्धि को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए पूरी सर्जिकल और एनेस्थेटिक टीम को बधाई दी। रामू के लिए लखीमपुर खीरी से वाराणसी तक की यात्रा सिर्फ एक चिकित्सीय जीत से कहीं अधिक थी। यह वो दिन था जब उसे अपना जीवन वापस मिला।
(इनपुट: ANI)
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