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गैस त्रासदी स्थल पर स्मारक की भी योजना

यूनियन कार्बाइड कचरा निपटान पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगी विषाक्तता रिपोर्ट

एमपी हाईकोर्ट ने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन फैक्ट्री से जुड़े विषाक्त कचरे के मामले में सरकार को 900 मीट्रिक टन राख के निपटान और उसकी विषाक्तता पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्दश दिया है।

यूनियन कार्बाइड कचरा निपटान पर हाईकोर्ट सख्त सरकार से मांगी विषाक्तता रिपोर्ट

MP High Court Seeks Report on Toxic Ash Disposal |

जबलपुर/भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन फैक्ट्री से जुड़े विषाक्त कचरे के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने गुरुवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि खतरनाक कचरे के दहन के बाद बची लगभग 900 मीट्रिक टन राख के निपटान और उसकी विषाक्तता पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। अदालत ने फैक्ट्री परिसर में भोपाल गैस स्मारक विकसित करने के लिए एक ठोस योजना भी मांगी है। इस मामले की अगली सुनवाई 22 जून को निर्धारित की गई है। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और अजय कुमार निरंकारी की खंडपीठ ने रामकी री-सस्टेनेबिलिटी वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी में दफन की गई राख की विषाक्तता पर आकलन रिपोर्ट मांगी।

पर्यावरण मानक के अनुरूप हो कार्ययोजना

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को भोपाल फैक्ट्री स्थल को सुरक्षित करने और गैस त्रासदी की स्मृति में स्मारक निर्माण के लिए विस्तृत कार्ययोजना पेश करने का निर्देश भी दिया। साथ ही संकेत दिया कि यह प्रक्रिया पर्यावरण संरक्षण मानकों के अनुरूप शुरू की जानी चाहिए। अदालत को बताया गया कि यूनियन कार्बाइड साइट के विषाक्त कचरे के निपटान के बाद करीब 900 मीट्रिक टन राख और अवशेष बचे हैं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि इस राख में रेडियोधर्मी तत्व और पारा जैसे खतरनाक पदार्थ हो सकते हैं, जिससे सुरक्षित निपटान एक गंभीर चुनौती बन गया है।

2004 से चल रहा मामला, लैंडफिल और सुरक्षा पर सवाल

यह मामला 2004 का है, जब विषाक्त कचरे के उचित निपटान के लिए जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई जारी रखी। याचिकाओं में यह भी चिंता जताई गई कि विषाक्त राख को आवासीय क्षेत्रों से मात्र 500 मीटर की दूरी पर दफन किया गया है, जो एक बड़ा खतरा पैदा करता है। अदालत ने पहले इस पर रोक लगाई थी, जिसे बाद में सरकार के आवेदन पर हटा लिया गया। अब अदालत ने विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिससे आगामी सुनवाई में इस संवेदनशील मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्णय की उम्मीद जताई जा रही है।

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