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नेपाल कांग्रेस में विवाद, देउबा सम्मेलन से दूर

नेपाल कांग्रेस में बढ़ा विवाद, देउबा ने 15वें आम सम्मेलन से बनाई दूरी

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और नेपाली कांग्रेस के नेताओं के एक धड़े ने पार्टी के 15वें आम सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में हिस्सा नहीं लिया।

नेपाल कांग्रेस में बढ़ा विवाद देउबा ने 15वें आम सम्मेलन से बनाई दूरी

Nepal Congress Rift Deepens, Deuba Skips General Convention |

काठमांडू [नेपाल]: नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और नेपाली कांग्रेस के नेताओं के एक धड़े ने पार्टी के 15वें आम सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में हिस्सा नहीं लिया। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर जारी विवाद के बीच देउबा गुट ने इस सम्मेलन से दूरी बनाई है। नेपाल की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी नेपाली कांग्रेस का यह आम सम्मेलन इस साल जनवरी में हुए विशेष सम्मेलन के करीब 8 महीने बाद आयोजित किया जा रहा है। दिसंबर 2021 के बाद यह पार्टी का पहला नियमित राष्ट्रीय सम्मेलन है। जनवरी में हुए विशेष सम्मेलन में गगन कुमार थापा को पार्टी अध्यक्ष चुना गया था। सम्मेलन में पार्टी के 54 प्रतिशत से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद थापा ने शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व की जगह ली। चुनाव आयोग ने 16 जनवरी को थापा के नेतृत्व वाली समिति को आधिकारिक मान्यता दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी 17 अप्रैल को इस मान्यता को बरकरार रखा था। हालांकि, अगस्त में अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार करने पर सहमति जताई।

थापा गुट ने देउबा के लिए सीट खाली रखी

पार्टी अध्यक्ष गगन कुमार थापा ने सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ नेता उनसे नाराज हैं और इसी वजह से कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। उन्होंने कहा, “आज हमने शेर बहादुर देउबा के लिए एक सीट खाली रखी थी। हमें उम्मीद थी कि वे उद्घाटन सत्र में आएंगे।” थापा ने कहा कि देउबा का सम्मान केवल उनके लिए सीट खाली रखने से नहीं, बल्कि पार्टी को आगे बढ़ाने और उसका प्रभाव बढ़ाने के काम से तय होना चाहिए।

देउबा गुट ने बुलाया अलग सम्मेलन

थापा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस नियमित सम्मेलन को पार्टी की वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है। वहीं, देउबा गुट इस प्रक्रिया का विरोध कर रहा है। देउबा खेमे ने 7 से 9 दिसंबर तक काठमांडू में पार्टी का एक अलग 15वां आम सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की है। इस तरह पार्टी के दोनों गुट अपनी-अपनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रहे हैं। पार्टी के आधे से अधिक प्रतिनिधियों द्वारा विशेष सम्मेलन की मांग पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद जनवरी में दूसरा विशेष सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें 54 प्रतिशत प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जबकि देउबा की केंद्रीय समिति के करीब 30 सदस्य ही इसमें शामिल हुए थे। इसी सम्मेलन में गगन थापा को अध्यक्ष चुना गया और नई केंद्रीय कार्यकारी समिति का गठन किया गया।

संविधान को लेकर दोनों गुटों में मतभेद

पार्टी के नियमों के अनुसार, विशेष सम्मेलन में चुनी गई समिति अंतरिम मानी जाती है। थापा गुट का कहना है कि इस समिति को अपनी वैधता सुनिश्चित करने के लिए एक साल के भीतर नियमित सम्मेलन आयोजित करना जरूरी है। नेपाली कांग्रेस के संविधान के अनुच्छेद 17 के मुताबिक, कम से कम 40 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधियों के अनुरोध पर विशेष आम सम्मेलन बुलाया जा सकता है। चुनाव आयोग ने जनवरी में थापा के नेतृत्व को मान्यता देते समय इसी प्रावधान का हवाला दिया था।

प्रतिनिधित्व के नियमों में भी हुआ बदलाव

जनवरी में संशोधित पार्टी संविधान में प्रतिनिधि बनने के नियमों में भी बदलाव किया गया। अब केंद्रीय समिति के सदस्य को स्वतः प्रतिनिधि बनने के बजाय वार्ड की सिफारिश और निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव की प्रक्रिया से गुजरना होगा। संशोधन में 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों के लिए केंद्रीय समिति की कम से कम 21 सीटें आरक्षित करने और विशेषज्ञों, श्रमिकों, प्रवासी नेपाली, दिव्यांगजनों तथा अल्पसंख्यकों के लिए कोटा निर्धारित करने का प्रावधान किया गया है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

सितंबर 2025 में जनरेशन Z के विरोध प्रदर्शनों से पहले ही पार्टी में नियमित सम्मेलन की तारीख को लेकर महीनों से विवाद चल रहा था। पिछले अक्टूबर में देउबा ने पूर्ण बहादुर खड़का को कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद तत्कालीन महासचिव गगन थापा और विश्व प्रकाश शर्मा के नेतृत्व वाले समूह ने विशेष सम्मेलन के लिए हस्ताक्षर जुटाए। 54.58 प्रतिशत प्रतिनिधियों के समर्थन वाला अनुरोध पार्टी मुख्यालय पहुंचा। देउबा गुट ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि नियमित सम्मेलन की प्रक्रिया पहले से आगे बढ़ रही है।

थापा की मान्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

जनवरी में विशेष सम्मेलन के दौरान थापा के अध्यक्ष चुने जाने से कुछ घंटे पहले देउबा की समिति ने थापा, विश्व प्रकाश शर्मा और फार्मुल्लाह मंसूर को निलंबित कर दिया था। बाद में चुनाव आयोग ने 16 जनवरी को थापा के नेतृत्व को मान्यता दी। 17 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मान्यता को बरकरार रखा। इसके बाद देउबा और पूर्ण बहादुर खड़का ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की। अगस्त की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार शर्मा की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर ली।

पुनर्विचार याचिका पर फैसला अभी बाकी

थापा के नेतृत्व वाले सम्मेलन को रोकने के लिए दायर याचिकाएं खारिज कर दी गईं, जिसके बाद सम्मेलन की तैयारियां जारी रहीं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका अभी लंबित है और सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है। देउबा गुट का कहना है कि अंतिम फैसला आने तक पार्टी का नेतृत्व विवाद खुला हुआ है और आगे बढ़ने से अदालत की अवमानना का जोखिम हो सकता है। इसी बीच इस गुट ने 7 से 9 दिसंबर तक काठमांडू में अपना 15वां आम सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की है।

(एएनआई)

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