ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित ऐतिहासिक और आस्था के प्रमुख केंद्र अचलेश्वर महादेव मंदिर प्रबंधन ने एक सराहनीय...
ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित ऐतिहासिक और आस्था के प्रमुख केंद्र अचलेश्वर महादेव मंदिर प्रबंधन ने एक सराहनीय और पर्यावरण-अनुकूल कदम उठाया है। अक्सर देखा जाता है कि देश के बड़े शिवालयों में श्रद्धालुओं द्वारा भगवान शिव पर अर्पित किया जाने वाला दूध, दही, पंचामृत और गंगाजल अभिषेक के बाद नालियों या सीवर में बह जाता है। इससे न केवल संसाधनों की बर्बादी होती है, बल्कि श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं भी आहत होती हैं।
भगवान को चढ़ाई सामग्री से तैयार होगी आर्गेनिक खाद
इस समस्या का स्थाई समाधान निकालते हुए अचलेश्वर मंदिर प्रबंधन ने एक बेहद अनोखी और नई पहल की शुरुआत की है। अब भगवान अचलनाथ को अर्पित की जाने वाली सभी अभिषेक सामग्रियां सीधे खेतों और गोशालाओं तक पहुंचेंगी, जिससे ऑर्गेनिक खाद तैयार की जाएगी।
श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान, अब सीवर में नहीं बहेगा पंचामृत
मंदिर प्रबंधन के मुताबिक, इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव पर चढ़ाए गए अभिषेक द्रव्य की पवित्रता और श्रद्धालुओं की आस्था को बनाए रखना है। इसके तहत अब मंदिर का कोई भी पवित्र जल या दूध सीवर या नाली में बेकार नहीं बहेगा, बल्कि उसे सहेजकर उसका सदुपयोग किया जाएगा। इस पहल को लेकर मंदिर में आने वाले भक्तों में भी भारी उत्साह और संतोष देखा जा रहा है।
ऐसे काम करेगी यह नई व्यवस्था
मंदिर परिसर में नंदी द्वार के पास 8 फीट का एक गहरा और पक्का कुंड बनाया जा रहा है। गर्भगृह में शिवलिंग पर चढ़ने वाला दूध, दही, पंचामृत और जल नालियों में जाने के बजाय सीधे इस भूमिगत टैंक में आकर एकत्रित होगा। इसके बाद मोटर और पाइपलाइन के जरिए इसे स्टोर किया जाएगा।
गोशाला को परिवहन
हर दिन इस एकत्रित दूध और जल को टैंकरों या ट्रैक्टरों के माध्यम से ग्वालियर की प्रसिद्ध लाल टिपारा स्थित आदर्श गोशाला भेजा जाएगा, जहाँ इसका उपयोग खेतों की सिंचाई और अन्य उपयोगी कार्यों में किया जाएगा।
फूल, माला और बेलपत्र से बनेगी 'हर्बल' और 'ऑर्गेनिक खाद'
तरल पदार्थों के अलावा भगवान शिव को चढ़ाए जाने वाले फूल, हार, पत्तियां और बेलपत्र को भी सहेजने के लिए मंदिर परिसर में अलग से बॉक्स रखे जा रहे हैं। इन सभी सामग्रियों को भी प्रतिदिन गोशाला भेजा जाएगा। वहाँ इन जैविक अवशेषों को प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद और हर्बल रंग तैयार किए जाएंगे, जिसका इस्तेमाल किसान अपने खेतों में कर सकेंगे। अचलेश्वर महादेव मंदिर की यह अनूठी पहल देश के अन्य बड़े मंदिरों के लिए भी एक मिसाल है। यह व्यवस्था 'कचरे से कंचन' (Waste to Wealth) के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का एक बेहतरीन तालमेल पेश करती है।
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