सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से व्यापक मूल्य नियंत्रण पर विचार करने को कहा।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश में दवाओं की कीमतों की व्यापक जांच का आह्वान किया और सवाल उठाया कि केंद्र द्वारा प्रस्तावित व्यापार मार्जिन विनियमन केवल कैंसर की दवाओं तक ही सीमित क्यों है। कोर्ट ने सरकार से आग्रह किया कि वह दवा बाजार में चिकित्सा उपकरणों सहित, अत्यधिक मार्कअप पर भी विचार करे। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कुछ कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन की 30 प्रतिशत सीमा लगाने के केंद्र के फैसले पर ध्यान दिया, लेकिन यह जानना चाहा कि अन्य दवाओं पर इसी तरह की जांच क्यों नहीं की जा सकती। बेंच ने पूछा, यह केवल कैंसर की दवाओं से संबंधित है। समग्र स्थिति का क्या? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि केंद्र सरकार कैंसर की दवाओं की एक सूची अधिसूचित करेगी, जिन पर प्रस्तावित व्यापार मार्जिन सीमा लागू होगी।
दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर उठे सवाल
उन्होंने कहा कि बाजार के घटनाक्रम और जन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के अनुसार, इस सूची को समय-समय पर अपडेट किया जाएगा ताकि सस्ती दवाओं को छोड़कर अन्य कैंसर रोधी दवाओं को शामिल किया जा सके। हालांकि, पीठ ने इस उपाय के सीमित दायरे पर सवाल उठाया। खुदरा विक्रेताओं को बेची जाने वाली दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों और उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में भारी अंतर के उदाहरण दिए। पीठ ने मूल्य असमानता को उजागर करते हुए कहा, एक सेलाइन ड्रिप लाइन का एमआरपी 11 रुपये है, जबकि यह 270 रुपये में बिक रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय निर्मित कार्डियक स्टेंट का भी जिक्र किया, जिसका खुदरा विक्रेता मूल्य (पीटीआर) 5,000 रुपये है, जबकि एमआरपी 25,000 रुपये है।
कार्डियक स्टेंट पर पहले से लागू है मूल्य सीमा
पीठ ने टिप्पणी की, अगर आप 16 प्रतिशत की सीमा लगाते हैं, तो आप (चिकित्सा) हस्तक्षेपों को तीन-चौथाई कम कर देंगे। डॉक्टर हस्तक्षेप इसलिए करवाते हैं, क्योंकि मुनाफा बहुत अधिक होता है। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि कार्डियक स्टेंट पर पहले से ही मूल्य सीमा लागू है। पीठ ने एज़िथ्रोमाइसिन की कीमत का हवाला देते हुए, 78.29 रुपये के एमआरपी और पीटीएस के लिए 2,850 रुपये की कीमत का जिक्र किया और सरकार से पूछा कि इस तरह की कीमत मरीजों के हित में कैसे है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि दवा की कीमत का नियमन सामर्थ्य, उपलब्धता और बाजार की स्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप बाजार की गतिशीलता को बाधित कर सकता है और दवाओं की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार पूरे फार्मास्युटिकल सिस्टम को नियंत्रित नहीं कर सकती।
दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछे सवाल
भाटी ने कहा, हम दवाओं के पूरे सिस्टम को नियंत्रित नहीं करना चाहते। पीठ ने पूछा, आप दवाओं की पूरी श्रृंखला को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकते? भाटी ने कहा कि भारत में पहले से ही विश्व स्तर पर सबसे कम दवाओं की कीमतें हैं और उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक हस्तक्षेप बाजार की गतिशीलता को नुकसान पहुंचा सकता है और उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा मूल्य निर्धारण तंत्र मरीजों को अत्यधिक मूल्यह्रास से पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखता है या नहीं। इसकी जांच करना आवश्यक है, खासकर जहां खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच बड़ा अंतर मौजूद हो। सर्वोच्च न्यायालय गैर-अनुसूचित दवाओं के प्रारंभिक मूल्यों के नियमन और चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य सीमा निर्धारित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।
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