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चैत्र नवरात्रि में भक्ति के रस में...

बुंदेलखंड का रहस्यमयी मंदिर, जहां डाकू भी झुकाते थे सिर, हर साल बढ़ रही है माता की चट्टान

Chaitra Navratri : चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर जहां पूरा देश शक्ति की भक्ति में डूबा है, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड...

बुंदेलखंड का रहस्यमयी मंदिर जहां डाकू भी झुकाते थे सिर हर साल बढ़ रही है माता की चट्टान

बुंदेलखंड का रहस्यमयी मंदिर, जहां डाकू भी झुकाते थे सिर, हर साल बढ़ रही है माता की चट्टान |

Chaitra Navratri : चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर जहां पूरा देश शक्ति की भक्ति में डूबा है, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में स्थित एक चमत्कारिक सिद्ध स्थल इन दिनों विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हम बात कर रहे हैं सागर, छतरपुर और टीकमगढ़ जिलों की सीमा पर स्थित 'अबार माता' मंदिर की, जो अपनी पौराणिक मान्यताओं और रहस्यमयी विशेषताओं के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

​70 फीट तक पहुंची चट्टान, आस्था का अद्भुत केंद्र

अबार माता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ मौजूद ग्रेनाइट की एक विशाल चट्टान है। स्थानीय लोगों की अटूट मान्यता है कि माता इसी चट्टान में साक्षात विराजमान हैं। बताया जाता है कि सदियों पहले यह चट्टान आकार में बहुत छोटी (महज कुछ फीट की) थी, लेकिन समय के साथ इसका आकार निरंतर बढ़ता गया और अब यह करीब 70 फीट ऊंची हो चुकी है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि हर साल इसकी लंबाई में वृद्धि होती है।

आल्हा-ऊदल के इतिहास से जुड़ा है

​करीब 1000 वर्ष पुराने इस मंदिर का संबंध बुंदेलखंड के महान योद्धा आल्हा और ऊदल से माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, जब आल्हा-ऊदल महोबा से माढ़ोगढ़ जा रहे थे, तब इस घने जंगल में उन्हें पहुँचने में देर हो गई थी। बुंदेली भाषा में देर होने को 'अबेर' कहा जाता है। उन्होंने यहीं रुककर माता की आराधना की और माता ने उन्हें दर्शन दिए, जिसके बाद इस स्थान का नाम 'अबार माता' प्रसिद्ध हो गया।

​डाकुओं में भी अटूट श्रद्धा

​एक समय यह क्षेत्र दस्यु प्रभावित (डाकुओं का गढ़) रहा है। मान्यता है कि पूर्व में कई कुख्यात दस्यु सरदार यहाँ गुप्त रूप से माता के दर्शन करने और माथा टेकने आते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, डाकू भी माता के दरबार में आकर नतमस्तक होते थे और अपनी सुरक्षा की मन्नत मांगते थे।

​निसंतान दंपत्तियों की भरती है झोली

​मंदिर से जुड़ी एक और गहरी आस्था यह है कि यहाँ मौजूद रहस्यमयी चट्टान को स्पर्श करने मात्र से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेष रूप से निसंतान दंपत्ति यहाँ बड़ी संख्या में पहुँचते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि माता उनकी सूनी गोद भर देती हैं। वर्तमान में चैत्र नवरात्रि के चलते मंदिर परिसर में भव्य मेले जैसा माहौल है और सागर, टीकमगढ़ व छतरपुर समेत दूर-दराज के इलाकों से हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं।

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