रायसेन। जिले के जमगढ़ गांव में एक पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान चट्टानी इलाके में करीब 800 मीटर लंबी पदचिह्नों...
मप्र के जंगलों में सदियों से छिपे 1,000 साल पुराने पदचिह्न, जैन संत से जुड़ाव की संभावना |
रायसेन। जिले के जमगढ़ गांव में एक पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान चट्टानी इलाके में करीब 800 मीटर लंबी पदचिह्नों की श्रृंखला मिली है। ये पदचिह्न चट्टानों पर उकेरे गए हैं। इनके साथ प्रारंभिक नागरी लिपि में दो पंक्तियों का एक शिलालेख भी मिला है, जिसे 10वीं–11वीं शताब्दी का माना जा रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि यह उत्कीर्ण मार्ग किसी जैन मुनि से जुड़ा हो सकता है, जो कभी इस वन क्षेत्र से होकर गुजरे होंगे।
पुरातत्वविद नैंसी व सहयोगियों की खोज
यह खोज भोपाल स्थित INTACH चैप्टर की पुरातत्वविद नैंसी शर्मा और उनके सहयोगी मिलनाथ पेटेले ने फील्ड सर्वे के दौरान की। नैंसी शर्मा ने बताया कि कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें गांव के ऊपर स्थित इस स्थान के बारे में जानकारी दी थी, जहां पहुंचना आसान नहीं है। कुछ पदचिह्न समय के साथ घिस चुके हैं और कुछ से छेड़छाड़ भी हुई है, लेकिन अधिकतर अब भी अच्छी स्थिति में सुरक्षित हैं।
घिसा हुआ शिलालेख भी मिला
पुरातत्वविदों के अनुसार, इस खोज का महत्व तब और बढ़ गया जब प्रमुख पदचिह्नों में से एक के पास घिसा हुआ शिलालेख मिला। INTACH मध्य प्रदेश के संयोजक एमएम उपाध्याय के अनुसार, शिलालेख में ‘श्री’, ‘सिद्ध’, ‘पाद’, ‘पंडित’ और ‘कारितः’ जैसे शब्द हैं, जो पवित्र स्मृति-परंपराओं से जुड़े माने जाते हैं। उपाध्याय ने बताया कि इन निष्कर्षों की जांच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अभिलेख विभाग के पूर्व निदेशक रवि शंकर ने की, जिन्होंने लिपि को परमार काल की प्रारंभिक नागरी लिपि बताया।
10वी शताब्दी के जैन परंपरा का प्रसार
वरिष्ठ पुरातत्वविद और परमार इतिहास विशेषज्ञ रमेश यादव ने इन पदचिह्नों को 10वीं–11वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश में जैन परंपराओं के प्रसार से जोड़ा। उनके अनुसार, उस समय मध्य प्रदेश में कई जैन मंदिर बने थे। भोजपुर के पास स्थित जैन मंदिर इसका उदाहरण हैं। रायसेन में मिले ये पदचिह्न संभवतः किसी अत्यंत विद्वान जैन संत के हो सकते हैं।
सिद्ध शब्द का प्रयोग, यह जैन मुनियों के लिए
रमेश यादव ने कहा कि शिलालेख में ‘सिद्ध’ शब्द का प्रयोग इस ओर संकेत करता है, क्योंकि यह शब्द जैन मुनियों के लिए प्रमुख रूप से इस्तेमाल होता रहा है। जिस तरह ये पदचिह्न गुफाओं से लगभग 600 मीटर दूर समाप्त होते हैं, उससे लगता है कि संत अपने मोक्ष समाधि की ओर जा रहे होंगे।
पंडित शब्द आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है
प्राचीन जैन इतिहास के विशेषज्ञ अरविंद जैन ने कहा कि शिलालेख में ‘पंडित’ शब्द संभवतः उस संत की विद्वता और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बौद्ध, जैन और शैव परंपराओं में पवित्र पदचिह्न मिलते हैं, लेकिन जीवित चट्टान पर उकेरा गया इतना लंबा पदचिह्न मार्ग एक असामान्य पुरातात्विक खोज है।
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