MP News : मुरैना। चंबल घड़ियाल अभयारण्य, जिसे लंबे समय से गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल प्रजाति के लिए भारत का सबसे सुरक्षित आश्रय माना जाता रहा है।
MP News : मुरैना। चंबल घड़ियाल अभयारण्य, जिसे लंबे समय से गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल प्रजाति के लिए भारत का सबसे सुरक्षित आश्रय माना जाता रहा है। अब यह एक अप्रत्याशित पारिस्थितिक चुनौती का सामना कर रहा है। यहां मगरमच्छों द्वारा युवा घड़ियालों का शिकार किए जाने के मामले सामने आए हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि छोड़े गए घड़ियालों पर लगाए गए रेडियो ट्रांसमीटरों से पहली बार आधिकारिक रूप से यह प्रमाण मिला है कि अभयारण्य के भीतर बार-बार मगरमच्छों द्वारा घड़ियालों पर हमला किया गया है।
यह तथ्य वन विभाग की ‘गो एंड रिलीज़’ संरक्षण योजना के अंतर्गत छोड़े गए घड़ियालों की नियमित निगरानी के दौरान सामने आया। अधिकारियों के अनुसार, लगभग तीन वर्ष तक की आयु और करीब 120 सेंटीमीटर लंबाई वाले घड़ियालों पर लगाए गए रेडियो ट्रांसमीटर नदी से संकेत देने के बजाय वयस्क मगरमच्छों के शरीर के भीतर से संकेत भेजते पाए गए। इसके बाद किए गए फील्ड सत्यापन में, मगरमच्छों के मल से घड़ियालों के अवशेष भी मिले, जिससे शिकार की पुष्टि हुई।
मालूम हो कि चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य 435 किलोमीटर क्षेत्र में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में फैला है। इसमें मगरमच्छों द्वारा घड़ियालों का शिकार किए जाने की औपचारिक रूप से पुष्टि हुई है। इस खोज ने वन्यजीव प्रबंधकों की चिंता बढ़ा दी है और अब वे उस क्षेत्र में संरक्षण रणनीतियों की पुनः समीक्षा कर रहे हैं, जिसे अब तक घड़ियालों का सबसे सुरक्षित आवास माना जाता था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह खतरा घड़ियालों के जीवन चक्र के एक अत्यंत संवेदनशील चरण में सामने आया है। जलीय वन्यजीव विशेषज्ञ ज्योति प्रसाद डंडोतिया ने बताया कि प्राकृतिक कारणों से भी घड़ियालों की जीवित रहने की दर पहले से ही कम है। उन्होंने कहा, चंबल नदी में हर साल आने वाली बाढ़ में केवल लगभग 3 प्रतिशत घड़ियाल शिशु ही जीवित रह पाते हैं। अब तीन वर्ष तक की आयु के किशोर घड़ियालों का मगरमच्छों द्वारा शिकार उनके वयस्क बनने की संभावना को और भी कम कर देता है।
उन्होंने बताया कि यही निष्कर्ष मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट के अध्ययनों में भी सामने आया है। चंबल नदी को 1970 के दशक के अंत में घड़ियाल संरक्षण के लिए चुना गया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक एच. आर. बस्टर्ड के नेतृत्व में किए गए वैश्विक सर्वेक्षणों में इसे दुनिया की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक और घड़ियालों के लिए उपयुक्त प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र वाला क्षेत्र पाया गया था। इसके बाद 1978–79 में मुरैना के पास देवरी घड़ियाल अभयारण्य की स्थापना अमेरिकी वित्तीय सहायता से की गई, जिसे आगे चलकर विस्तारित कर वर्तमान चंबल घड़ियाल अभयारण्य का रूप दिया गया।
अभयारण्य की स्थापना के बाद संरक्षण प्रयासों से उल्लेखनीय सफलता मिली है। 2025 की गणना के अनुसार, चंबल क्षेत्र में अब 2,462 घड़ियाल पाए जाते हैं, जबकि प्रारंभिक वर्षों में केवल 75 घड़ियाल छोड़े गए थे। इसके विपरीत, बिहार की गंडक नदी और नेपाल के कोसी क्षेत्र में लगभग 400-400 घड़ियाल ही मौजूद हैं। वर्तमान संरक्षण मॉडल के तहत हर वर्ष मार्च–अप्रैल में नदी किनारों से लगभग 200 अंडे एकत्र किए जाते हैं और उन्हें देवरी अभयारण्य में संरक्षित वातावरण में सेया जाता है। घड़ियाल शिशुओं को नियंत्रित परिस्थितियों में पाला जाता है और जब वे तीन वर्ष की आयु या 120 सेंटीमीटर लंबाई तक पहुंच जाते हैं, तब उन्हें नदी में छोड़ा जाता है।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अब वे किशोर घड़ियालों की मृत्यु दर कम करने के लिए नए उपायों पर विचार कर रहे हैं। इनमें रिलीज़ किए जाने वाले स्थानों की पुनः समीक्षा और शिकारी–शिकार (Predator–Prey) संबंधों का गहन अध्ययन शामिल है। अधिकारियों का कहना है कि युवा घड़ियालों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चंबल में दीर्घकालिक घड़ियाल आबादी बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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