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ब्रिटेन के फंड से देश में बसाए जा रहे थे रोहिंग्या

FCRA फंडिंग के जरिए रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भंडाफोड़

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी फंडिंग (FCRA) का इस्तेमाल कर भारत में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को अवैध रूप से बसाने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है।

fcra फंडिंग के जरिए रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भंडाफोड़

ED Busts FCRA-Funded Illegal Infiltration Network |

नई दिल्ली। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी फंडिंग (FCRA) का इस्तेमाल कर भारत में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को अवैध रूप से बसाने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है। ईडी की लखनऊ जोनल टीम द्वारा पांच राज्यों के 13 ठिकानों पर की गई ताबड़तोड़ छापेमारी में यह सामने आया है कि किस तरह चैरिटेबल ट्रस्टों की आड़ में इस अवैध घुसपैठ को देश के भीतर स्थायी रूप से संस्थागत रूप दिया जा रहा था।

घुसपैठ और फंडिंग नेटवर्क

  • यूपी एटीएस (ATS) की एफआईआर से खुला राज: इस मनी लॉन्ड्रिंग जांच की शुरुआत उत्तर प्रदेश पुलिस की एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर से हुई थी। इसमें रोहिंग्या और बांग्लादेशियों के अवैध प्रवेश और उनके फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले सिंडिकेट का खुलासा हुआ था।
  • ईडी की एंट्री (ECIR): एटीएस की एफआईआर को आधार (Predicate Offence) बनाकर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला (ECIR No. ECIR/LKZO/14/2024) दर्ज किया और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 के तहत जांच अपने हाथ में ली।
  • विदेशी फंडिंग का खेल: जांच में पाया गया कि ब्रिटेन (UK) स्थित संदिग्ध संस्थाओं से भारत के एफसीआरए-पंजीकृत पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्टों में मोटी रकम भेजी जा रही थी, जिसे बाद में अवैध घुसपैठ के लिए डायवर्ट कर दिया गया।

कैसे काम कर रहा था सिंडिकेट?

ईडी की जांच में इस सिंडिकेट के काम करने का बेहद शातिराना तरीका (Modus Operandi) सामने आया है। ब्रिटेन से आने वाले इस फंड को सीधे तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय, सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचाने के लिए संदिग्ध और फर्जी बैंक खातों (Mule Accounts) के माध्यम से 6,000 रुपये, 8,000 रुपये और 10,000 रुपये जैसी छोटी-छोटी किश्तों में ट्रांसफर किया जाता था। इसके अलावा, पैसे के असली स्रोत को छिपाने के लिए कई स्तरों पर बैंकिंग लेनदेन (Layered Transactions) और भारी मात्रा में नकद निकासी (Cash Withdrawals) का भी सहारा लिया गया ताकि जांच एजेंसियों के लिए मुख्य साजिशकर्ताओं तक पहुंचना नामुमकिन हो जाए।

अवैध प्रवासियों को भारत में स्थायी रूप से बसाने की थी योजना

मामले की संवेदनशीलता और गहराई को स्पष्ट करते हुए इस जांच से जुड़े अधिकारियों ने बताया, "इस मनी लॉन्ड्रिंग से शोधित किए गए धन का अंतिम उद्देश्य अवैध प्रवासियों का आर्थिक पुनर्वास (Economic Rehabilitation) करना था ताकि उन्हें भारत के भीतर स्थायी रूप से बसाया जा सके।"  यह नेटवर्क केवल सीमा पार कराने तक सीमित नहीं था। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों से भारत की सीमा में प्रवेश कराने के बाद अलग-अलग समूहों को जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। एक समूह घुसपैठियों के लिए आधार कार्ड, पैन कार्ड और पासपोर्ट जैसे फर्जी भारतीय पहचान दस्तावेज तैयार करता था, जबकि दूसरा समूह इन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में रोजगार के लिए भेज देता था।

पांच राज्यों में ईडी की ताबड़तोड़ छापेमारी

घुसपैठियों को भारत में टिकाए रखने और उनकी स्थायी आय सुनिश्चित करने के लिए सिंडिकेट ने व्यापक प्रबंध कर रखे थे। अधिकारियों के अनुसार इस ट्रस्ट ने इन घुसपैठियों को नकद सहायता, नौकरियां या ई-रिक्शा जैसे वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराए ताकि उनकी नियमित कमाई हो सके और वे यहीं बस जाएं।" ईडी की लखनऊ जोनल टीम ने स्थानीय पुलिस के साथ तालमेल बिठाकर गुरुवार सुबह से ही दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के कुल 13 ठिकानों पर तलाशी अभियान शुरू किया।

  • दिल्ली: बटला हाउस और मदनपुर खादर।
  • उत्तर प्रदेश: देवबंद (सहारनपुर)।
  • हरियाणा: बल्लभगढ़ (फरीदाबाद)।
  • महाराष्ट्र: रायगढ़।
  • पश्चिम बंगाल: कोलकाता, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और मुर्शिदाबाद।

इस छापेमारी के दौरान मुख्य संदिग्धों के अलावा दिल्ली के मदनपुर खादर स्थित 'सन शाइन हेल्थ एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी', उत्तर 24 परगना के 'कबीरबाग मिल्लत एकेडमी' और सहारनपुर के 'हरोरा अल-जामियतुल इस्लामिया दारुल उलूम' जैसे संस्थानों के परिसरों की सघन तलाशी ली गई। जांच टीमों ने डिजिटल उपकरणों और आपत्तिजनक दस्तावेजों को कब्जे में लेकर कई महत्वपूर्ण लोगों के बयान दर्ज किए हैं।
​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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