MP News : ग्वालियर। एशिया का सबसे बड़ा और सबसे अनोखा नवग्रह मंदिर ग्वालियर के पास डबरा में बनाया गया है।
हिंदू धर्म में 108 का है विशेष महत्व, प्राण प्रतिष्ठा अलगे महीने 11 से 20 फरवरी तक |
MP News : ग्वालियर। एशिया का सबसे बड़ा और सबसे अनोखा नवग्रह मंदिर ग्वालियर के पास डबरा में बनाया गया है। यह मंदिर 12 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी विशेषता यह है कि यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां नौ ग्रहों की पूजा उनकी पत्नियों सहित की जाती है। सनातन धर्म के प्राचीन सिद्धांतों, वास्तु शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के आधार पर निर्मित यह मंदिर आने वाले समय में एक प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन केंद्र बनने जा रहा है। मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह अगले महीने 11 फरवरी से 20 फरवरी तक आयोजित होगा।
108 के पवित्र अंक पर आधारित मंदिर
यह नवग्रह मंदिर 108 स्तंभों पर स्थापित है। हिंदू धर्म में 108 का विशेष महत्व माना जाता है। ब्रह्मांड में 27 नक्षत्र होते हैं और प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण/दिशाएँ होती हैं। इस प्रकार 27×4 = 108 होता है। प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मांड की संरचना भी इसी संख्या के इर्द-गिर्द मानी जाती है। यह भी विश्वास है कि शरीर में 108 ऊर्जा-रेखाएँ हृदय-चक्र का निर्माण करती हैं। इसी मान्यता के आधार पर पूरे मंदिर परिसर की योजना 108 की अवधारणा पर तैयार की गई है।
ग्रहों की सावधानीपूर्वक स्थापना
नवग्रहों की स्थापना ज्योतिष और स्थापत्य के विस्तृत अध्ययन के बाद की गई है। प्रत्येक ग्रह के मंदिर को इस प्रकार रखा गया है कि कोई भी ग्रह दूसरे ग्रह की ओर मुख नहीं करता। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि ऊर्जाओं का टकराव न हो।सूर्य मंदिर की तीव्रता को नियंत्रित करने के लिए जल-तालाब, निकासी व्यवस्था (ड्रेनेज) और झरोखे जैसी विशेष संरचनाएँ भी बनाई गई हैं।
तीन मंज़िलें, अलग-अलग गर्भगृह
मंदिर में तीन मंज़िलें हैं और हर मंज़िल का अलग उद्देश्य है। भूतल (ग्राउंड फ्लोर) पर आठ ग्रहों की संगमरमर की मूर्तियाँ स्थापित हैं। पहली मंज़िल पर मुख्य देवता भगवान सूर्य को उनकी दो पत्नियों के साथ स्थापित किया गया है। सूर्य की मूर्ति अष्टधातु की बनी है। प्रवेश पर सफेद संगमरमर के सात घोड़े स्थापित हैं। प्रत्येक ग्रह की पूजा उसकी पत्नी सहित होती है। सभी मूर्तियाँ अष्टधातु की हैं और ग्रह के स्वाभाविक रंग के अनुसार रंगाई गई हैं। प्रत्येक गर्भगृह के द्वारों पर मंत्र अंकित हैं। दूसरी मंज़िल पर ग्रहों के अधिष्ठाता देवताओं की स्थापना की गई है।
सूर्य की ऊर्जा संतुलित करने के लिए जल-व्यवस्था
मंदिर क्षेत्र के बराबर आकार का एक तालाब पास में बनाया गया है। इस तालाब का पानी मंदिर के चारों ओर बहता हुआ फिर वापस तालाब में लौटता है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार सूर्य की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए जल आवश्यक माना जाता है, इसलिए यह व्यवस्था पृथ्वी पर सूर्यदेव की स्थापना के बाद उनकी तीव्रता नियंत्रित करने हेतु बनाई गई है। उदाहरण के तौर पर ग्वालियर के सूर्य मंदिर का उल्लेख किया जाता है, जहां जल-व्यवस्था न होने से असंतुलन होने की मान्यता बताई जाती है।सूर्य की तीव्रता कम करने हेतु तालाब बनाया गया है।
द्रविड़ स्थापत्य शैली में निर्माण
यह मंदिर दक्षिण भारत की द्रविड़ स्थापत्य शैली में बनाया गया है।वास्तुकार अनिल शर्मा के अनुसार मंदिर में पारंपरिक द्रविड़ विशेषताएँ हैं—आधार वर्गाकार है और गर्भगृह के ऊपर का शिखर बहु-स्तरीय पिरामिडाकार है। अमलक और कलश के स्थान पर ऊपर स्तूपिका लगाई गई है। मंदिर ऊँचा है और चारों ओर विशाल प्रांगण है। परिसर में छोटे मंदिर, कक्ष, जलकुंड, दीप-स्तंभ और ध्वज-स्तंभ भी हैं। मुख्य प्रवेश द्वार भव्य गोपुरम है।
9,000 वर्गफुट में नक्षत्र वन
मंदिर परिसर में 9,000 वर्गफुट में एक नक्षत्र वन विकसित किया गया है। यहां हर वृक्ष एक-एक नक्षत्र का प्रतिनिधित्व करता है। श्रद्धालु हर वृक्ष की परिक्रमा कर सकते हैं। इस परिक्रमा को ही पूर्ण नवग्रह पूजा माना गया है। मान्यता है कि इस परिक्रमा से व्यक्ति की आधी परेशानियाँ दूर हो जाती हैं।
काशी के कारीगरों ने गढ़ीं मूर्तियाँ
नवग्रहों, उनकी पत्नियों और अधिष्ठाता देवताओं की मूर्तियाँ उत्तर प्रदेश के काशी के कुशल शिल्पकारों द्वारा बनाई गई हैं। मूर्तिकार संजय कुमार के अनुसार, लगभग 400 कारीगरों ने ढाई वर्षों तक दिन-रात काम किया। मुख्य मूर्तियाँ अष्टधातु की हैं, जबकि संगमरमर की प्रतिमाएँ राजस्थान, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के शिल्पकारों ने तैयार कीं। हर बारीकी पर ध्यान दिया गया ताकि छोटी-सी भी त्रुटि न रहे।
एक ही स्थान पर सभी ग्रहों की शांति-पूजा
यह मंदिर परशुराम लोक न्यास द्वारा बनवाया गया है। मंदिर के संरक्षक और पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के बड़े भाई डॉ. श्रीमान नारायण मिश्रा ने बताया कि यह परियोजना स्थापत्य, ज्योतिष और विज्ञान का समन्वय है।यह देश का पहला ऐसा मंदिर बताया जा रहा है, जहां श्रद्धालु नौ ग्रहों की पूजा एक साथ कर ग्रह-शांति कर सकते हैं। पहले तक भक्तों को अलग-अलग ग्रहों के लिए अलग मंदिरों में जाना पड़ता था।डॉ. मिश्रा के अनुसार इस विचार की शुरुआत 2010 में हुई, जब परिसर में उनकी माता की इच्छा से महालक्ष्मी मंदिर बनाया गया।
बाद में डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने नवग्रह मंदिर की योजना बनाई। ग्रहों को उनकी पत्नियों सहित स्थापित करने का सुझाव दाती महाराज ने दिया। कुछ वर्ष पहले NASA के वैज्ञानिकों ने भी स्थल का दौरा किया था और अवधारणा से प्रभावित हुए थे। अब लोग मंदिरों में दर्शन के लिए आने भी लगे हैं।
11 से 20 फरवरी तक प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम
प्राण-प्रतिष्ठा समारोह 11 फरवरी से 20 फरवरी तक होगा।पं. प्रदीप मिश्रा 11 से 13 फरवरी तक प्रवचन देंगे।कवि कुमार विश्वास 14 से 16 फरवरी तक प्रस्तुति देंगे।बागेश्वर धाम के पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री 17 से 19 फरवरी तक प्रवचन करेंगे।समारोह का समापन 20 फरवरी को भंडारे के साथ होगा। परिसर में एक 9 मंज़िला यज्ञशाला भी बनाई गई है, जहां प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दी जाएंगी।
पर्यटन मानचित्र पर उभरता डबरा
नवग्रह मंदिर के पूर्ण होने के बाद डबरा एक नया धार्मिक पर्यटन स्थल बनकर उभरा है। ग्वालियर से ओरछा जाने वाले यात्री अब दतिया पीतांबरा पीठ और ओरछा जाने से पहले डबरा में भी रुकने लगे हैं। प्राण-प्रतिष्ठा से पहले ही प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
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