न्यायालय ने पिछड़ा वर्ग आयोग को भी याचिका में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया और राज्य सरकार से आयोग की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रखने को कहा।
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ग्राम पंचायत चुनाव में देरी को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है। साथ ही उसे विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा कि यदि धारा 12(3-ए) के तहत ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का आदेश उच्च न्यायालय द्वारा पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है, तो ऐसा अवैध आदेश दोबारा क्यों जारी किया गया?
चेतावनी, जवाब नहीं मिलने पर संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा
न्यायालय ने पिछड़ा वर्ग आयोग को भी याचिका में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया और राज्य सरकार से आयोग की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रखने को कहा। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को पंचायत चुनाव कब तक कराए जाएंगे, इसकी सूचना न्यायालय को अवश्य देनी होगी; ऐसा न करने पर संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा। याचिकाकर्ता अरविंद राठौर ने 25 और 26 मई के दो सरकारी आदेशों को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ये आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत जारी किए गए थे, जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में पहले ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
सरकार का तर्क, ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग की रिपोर्ट का इंतजार
राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ने न्यायालय को सूचित किया कि राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के लिए एक आयोग का गठन किया है और आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने तक ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्यों के पदों के लिए चुनाव नहीं कराए जा सकते। इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार आयोग का गठन किया गया था, फिर भी उसने अभी तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है।
राज्य चुनाव आयोग ने न्यायालय को सूचित किया कि मतदाता सूची 10 जून को प्रकाशित हो चुकी है और वह चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा आवश्यक व्यवस्था न करने के कारण चुनाव प्रक्रिया रुक गई है।
प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने टिप्पणी की कि चूंकि विवादित सरकारी आदेश असंवैधानिक प्रावधान के तहत जारी किए गए थे, इसलिए वे कानून की दृष्टि में अमान्य और निरर्थक हैं। न्यायालय ने आगे कहा कि ग्राम प्रधानों को कानून के तहत प्रशासक के रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए न्यायालय ने उसे ओबीसी आयोग की रिपोर्ट की स्थिति और चुनाव कराने की समयसीमा बताते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई की तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
पूछा, वैधानिक प्रावधान के आधार पर आदेश क्यों
अदालत ने यह भी स्पष्टीकरण मांगा कि सरकार ने उस वैधानिक प्रावधान के आधार पर आदेश क्यों जारी किए जिसे उच्च न्यायालय की खंडपीठ पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है। अदालत ने चेतावनी दी कि कार्रवाई का औचित्य सिद्ध न कर पाने पर अदालत की अवमानना मानी जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को दोपहर 2:00 बजे होगी।
यह मामला संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के के तहत पंचायतों के निश्चित कार्यकाल और राज्य चुनाव आयोग की स्वायत्तता से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है। (एएनआई)
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