इंदौर। शहर में शुक्रवार शाम एक नाटकीय घटना सामने आई, जब एक युवक ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के...
इंदौर। शहर में शुक्रवार शाम एक नाटकीय घटना सामने आई, जब एक युवक ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के काफिले के सामने आकर अपनी मां की मौत के मामले में न्याय की मांग की। युवक का आरोप है कि उसकी मां की मौत एक अवैध क्लिनिक में लगाए गए खतरनाक इंजेक्शन के कारण हुई थी।
पुलिस नहीं कर रही कार्रवाई
युवक का नाम रोहन चौहान है और उसकी मां का नाम मंजू चौहान था। रोहन का कहना है कि पुलिस और स्वास्थ्य विभाग पिछले पांच महीनों से मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, इसलिए मजबूर होकर उसे यह कदम उठाना पड़ा।
सीएम के काफिले को रोका
शुक्रवार शाम जब मुख्यमंत्री मोहन यादव का काफिला इंदौर से गुजर रहा था, तभी रोहन चौहान अचानक सड़क पर आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में एक बैनर था और वह जोर-जोर से न्याय की मांग कर रहा था।
सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई को सीएम ने रोका
सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत कार्रवाई की, लेकिन मुख्यमंत्री ने काफिला रुकवाने का आदेश दिया। इसके बाद रोहन ने मुख्यमंत्री को एक लिखित ज्ञापन सौंपा, जिसमें उसने अपनी मां की मौत की पूरी घटना बताते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। रोहन ने चेतावनी दी कि यदि जल्द न्याय नहीं मिला तो वह जन आंदोलन शुरू करेगा।
6 अक्टूबर को इलाज के लिए ले जाया गया
यह मामला 6 अक्टूबर 2025 का बताया जा रहा है। इंदौर के खटीवाला टैंक क्षेत्र में स्थित हर्ष क्लिनिक में मंजू चौहान को इलाज के लिए ले जाया गया था। रोहन का आरोप है कि बिना उचित जांच और निदान के उनकी मां को खतरनाक इंजेक्शन लगा दिया गया। इंजेक्शन लगने के बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ गई और उसी दिन उनकी मौत हो गई।
लापरवाही का आरोप
मौत के बाद परिवार ने मेडिकल लापरवाही का आरोप लगाया और इलाज से जुड़े दस्तावेज तथा मृत्यु प्रमाणपत्र की मांग की। इसके बाद क्लिनिक में करीब ढाई घंटे तक हंगामा हुआ। सूचना मिलने पर पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और ड्रग इंस्पेक्टर की टीम मौके पर पहुंची और जांच के बाद क्लिनिक को सील कर दिया गया।
जांच में मिली बड़ी गड़बड़ियां
स्वास्थ्य विभाग की जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। क्लिनिक डॉ. ज्ञानचंद पंजवानी के नाम से पंजीकृत था। लेकिन पिछले तीन महीनों से डॉक्टर स्वयं क्लिनिक में मौजूद नहीं थे। उनकी जगह एक सहायक मरीजों का इलाज कर रहा था, दवाइयां दे रहा था और क्लिनिक चला रहा था। इसके अलावा क्लिनिक में 15 बेड लगाए गए थे, जबकि उसके पंजीकरण के अनुसार यह केवल एक सामान्य क्लिनिक था, न कि नर्सिंग होम। उस समय सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने भी माना था कि जांच में “गंभीर अनियमितताएं” मिली हैं।
पाकिस्तान से डिग्री का आरोप
रोहन चौहान ने अपने ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया कि क्लिनिक के नाम पर दर्ज डॉक्टर डॉ. ज्ञानचंद पंजवानी की मेडिकल डिग्री पाकिस्तान से है। भारत में किसी विदेशी डिग्री वाले डॉक्टर को प्रैक्टिस करने से पहले नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) से मान्यता लेनी होती है। इसलिए इस आरोप की आधिकारिक जांच जरूरी मानी जा रही है।
डॉक्टर ने क्या कहा?
डॉ. पंजवानी ने कहा कि मंजू चौहान को 18 सितंबर को क्लिनिक लाया गया था और उन्हें मानसिक बीमारी थी। उस दिन वह स्वयं क्लिनिक में मौजूद नहीं थे और उनके सहायक ने केवल सलाइन चढ़ाई थी। उनका कहना है कि बाद में परिवार उन्हें दूसरे निजी अस्पताल ले गया, जहां उसी दिन उनकी मौत हो गई। हालांकि डॉक्टर और परिवार के बयान में कई विरोधाभास हैं, जैसे तारीख, इलाज का प्रकार और मौत का स्थान।
सबसे बड़ी कमी, न पोस्टमार्टम, न एफआईआर
रोहन का कहना है कि उनकी मां की मौत के बाद पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया। ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम बेहद जरूरी होता है, क्योंकि उसी से मौत का वास्तविक कारण पता चलता है। इसके अलावा परिवार का आरोप है कि पांच महीनों में न तो एफआईआर दर्ज हुई और न ही कोई ठोस कार्रवाई हुई।
नकली डॉक्टरों का जाल बड़ी समस्या
यह मामला भारत में बढ़ती अवैध क्लिनिक और अपंजीकृत डॉक्टरों की समस्या को भी उजागर करता है। अक्सर कुछ क्लिनिक किसी पंजीकृत डॉक्टर के नाम पर चलते हैं, लेकिन वास्तविकता में वहां अयोग्य लोग इलाज करते हैं। जब कोई दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है।
अब क्या होना चाहिए?
मामले में जवाबदेही तय करने के लिए कई कदम जरूरी माने जा रहे हैं। धारा 304A के तहत एफआईआर दर्ज करना (लापरवाही से मौत)। उपलब्ध सबूतों की फॉरेंसिक जांच। डॉक्टर की डिग्री और पंजीकरण की NMC से जांच। क्लिनिक चलाने वाले सहायक के खिलाफ कार्रवाई। स्वास्थ्य विभाग की जांच में देरी की जवाबदेही तय करना।
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