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धार में फिर कानून-व्यवस्था को चुनौती, जुमा और बसंत

जुमा और बसंत पंचमी एक साथ, धार में फिर कानून-व्यवस्था को चुनौती

MP News : धार। ऐतिहासिक नगर धार एक बार फिर संवेदनशील कानून-व्यवस्था की स्थिति का सामना कर रहा है। 23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन ..

जुमा और बसंत पंचमी एक साथ धार में फिर कानून-व्यवस्था को चुनौती

जुमा और बसंत पंचमी एक साथ, धार में फिर कानून-व्यवस्था को चुनौती |

MP News : धार। ऐतिहासिक नगर धार एक बार फिर संवेदनशील कानून-व्यवस्था की स्थिति का सामना कर रहा है। 23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ने से भोजशाला–कमाल मौला परिसर को लेकर दशकों पुराना विवाद फिर से केंद्र में आ गया है। इस संयोग ने जिला प्रशासन को हाई अलर्ट हो गया है।

यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित है और लंबे समय से धार्मिक, ऐतिहासिक और कानूनी दावों का विषय रहा है।हिंदू समुदाय इसे मां सरस्वती (वाग्देवी) को समर्पित प्राचीन शिक्षा केंद्र और मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है, जहाँ सदियों से नमाज़ अदा की जाती रही है।

दबाव में आ गई नाजुक पूजा व्यवस्था

पिछले दो दशकों से अधिक समय से इस परिसर में पूजा-पाठ समय-विभाजन (टाइम-शेयरिंग) व्यवस्था के तहत होता रहा है। इसके अनुसार,हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा की अनुमति है।मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की अनुमति है।

समस्या शुक्रवार को..

समस्या तब पैदा होती है जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है, क्योंकि दोनों समुदाय एक ही समय पर परिसर में प्रवेश चाहते हैं।2006 और 2013 में ऐसे ही हालात बने थे, जब भारी भीड़ और तनाव के कारण पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा था। 2016 में प्रशासन ने दिन को अलग-अलग समय-खंडों में बाँटकर हिंदू पूजा और जुमे की नमाज़ कराने का प्रयास किया, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान साबित नहीं हुई और आज भी कानूनी चुनौती में है।

कानूनी अस्पष्टता ही बार-बार टकराव की वजह

विवाद की जड़ 7 अप्रैल 2003 का वह आदेश है, जो परिसर में पूजा-पाठ को नियंत्रित करता है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़े तो क्या व्यवस्था होगी।
इसी कानूनी खालीपन के कारण ऐसे वर्षों में प्रशासन को बार-बार संकट प्रबंधन, अतिरिक्त सुरक्षा और न्यायिक हस्तक्षेप का सहारा लेना पड़ता है।

हिंदू संगठनों का आंदोलन तेज

इस वर्ष हिंदू संगठनों ने मालवा-निमाड़ क्षेत्र में आंदोलन तेज कर दिया है। जगह-जगह ‘चलो भोजशाला’ के नारे वाले स्वागत द्वार लगाए गए हैं। हिंदू संगठनों की मांग है कि बसंत पंचमी के दिन पूरा दिन निर्बाध पूजा की अनुमति दी जाए। साथ ही, उन्होंने भोजशाला परिसर से सभी अतिक्रमण हटाने और मंदिर के पुनर्स्थापन की भी मांग की है, वहीं मुस्लिम प्रतिनिधियों ने प्रशासन से संपर्क कर यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि शुक्रवार की नमाज़ बिना किसी बाधा के हो, और इसके लिए उन्होंने पुराने उदाहरणों व सरकारी अभिलेखों का हवाला दिया है।

टकराती ऐतिहासिक व्याख्याएं

हिंदू पक्ष: सरस्वती कंठाभरण और राजा भोज की विरासतहिंदू संगठनों के अनुसार यह संरचना 1034 ईस्वी में मालवा के परमार शासक राजा भोज द्वारा बनवाई गई थी। इसे सरस्वती कंठाभरण या शारदा सदन कहा जाता था और यह संस्कृत शिक्षा का प्रमुख गुरुकुल था। उनका दावा है कि यह परंपरा राजा भोज की मृत्यु (1054 ई.) के बाद भी लगभग 250 वर्षों तक चली और 14वीं सदी की शुरुआत तक सक्रिय रही। 1305 ई. के आसपास हुए आक्रमणों के बाद यह केंद्र नष्ट हुआ और विद्वानों को पलायन करना पड़ा। हिंदू संगठन ASI के हालिया वैज्ञानिक सर्वेक्षण को भी अपने दावे के समर्थन में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी आधार पर वे कहते हैं कि बसंत पंचमी, जो मां सरस्वती की जयंती के रूप में मनाई जाती है, पर विशेष और पूर्ण पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।

मुस्लिम पक्ष: कमाल मौला मस्जिद और नमाज़ की निरंतरता

मुस्लिम पक्ष मंदिर-उद्गम के दावे को नकारता है। उनका कहना है कि यह संरचना 1307 ईस्वी (हिजरी 705) में हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती द्वारा निर्मित कमाल मौला मस्जिद है।
उनका दावा है कि यहां निर्माण काल से ही निरंतर नमाज़ होती रही है। वे 1935 की गजट अधिसूचना का हवाला देते हैं, जिसमें इस स्थल को मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है और भविष्य में भी मस्जिद बने रहने की बात कही गई है।

कमाल मौला मस्जिद के प्रतिनिधि जुल्फिकार पठान ने कहा, “1998, 2006, 2013 और 2016 में, जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी थी, तब भी यहां शुक्रवार की नमाज़ अदा की गई थी।”
उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय शांति बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

ASI सर्वे और अदालत की निगरानी

विवाद को नई गति तब मिली जब ASI ने अपनी वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पेश की। याचिकाकर्ता गोपाल शर्मा के अनुसार, रिपोर्ट में इंडो-सस्सानियन काल से लेकर ब्रिटिश काल तक के सिक्के, देवी-देवताओं, मानव और पशु आकृतियों वाली मूर्तियां और स्थापत्य अवशेष मिलने का उल्लेख है। जहां हिंदू पक्ष इसे मंदिर-मूल का प्रमाण मान रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि पुराने स्थापत्य तत्वों का पुनः उपयोग मस्जिद के धार्मिक स्वरूप को नहीं बदलता।

मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित

23 जनवरी 2026 को पूजा-पाठ के अधिकारों से जुड़ा तात्कालिक मुद्दा अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है।वरिष्ठ अधिवक्ता जैन ने कहा,“मामले की सुनवाई नियत समय पर होगी। मुख्य विवाद अलग से न्यायिक विचाराधीन है। ASI अपनी रिपोर्ट सौंप चुका है और आगे की कार्यवाही मुख्य मामले में होगी।”

प्रशासन पूरी तरह सतर्क

दोनों पक्षों के अडिग रुख को देखते हुए धार जिला प्रशासन ने सुरक्षा और खुफिया निगरानी कड़ी कर दी है। बड़ी संख्या में पुलिस बल, सादे कपड़ों में जवान और सतत निगरानी तैनात की गई है।
अधिकारियों का कहना है कि समुदायों के प्रतिनिधियों से संवाद जारी है, लेकिन प्रशासन का दायरा केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अदालत व ASI के निर्देशों का पालन कराने तक सीमित है।
23 जनवरी के नजदीक आते ही धार एक बार फिर टकराती ऐतिहासिक धारणाओं, अधूरे कानूनी सवालों और साम्प्रदायिक शांति की चुनौती के बीच खड़ा है।

 

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