इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, कंपनियां वित्तीय बोझ का हवाला देकर श्रमिकों के कानूनी लाभ रोक नहीं सकतीं; मजदूरों की भूख तिजोरी से बड़ी है।
प्रयागराज। औद्योगिक इकाइयां वित्तीय बोझ का रोना रोकर श्रमिकों को उनके कानूनी लाभ से वंचित नहीं कर सकतीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह बात बोनस भुगतान (संशोधन) अधिनियम-2015 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। कोर्ट ने कहा कि मजदूरों की भूख कंपनियों की तिजोरियों से बड़ी होती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने इस टिप्पणी के साथ 30 से अधिक नामचीन कंपनियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक इकाइयां वित्तीय बोझ का रोना रोकर श्रमिकों को उनके कानूनी लाभ से वंचित नहीं कर सकतीं। उनके (मजदूरों) हक में बने कानून को सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता कि कंपनी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।कंपनियों की तिजोरियों से बड़ी मजदूरों की भूख है।
कंपनियों ने बोनस कानून को चुनौती दी
दरअसल 30 से अधिक नामचीन कंपनियों ने बोनस भुगतान (संशोधन) अधिनियम-2015 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल की थीं। केंद्र सरकार ने 2015 में कानून बदलकर बोनस पात्रता की सीमा 10,000 से बढ़ाकर 21,000 और गणना की सीमा 3,500 से बढ़ाकर 7,000 कर दी थी। इस संशोधन से ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारी भी बोनस पाने के अधिकार हो गए। इस नियम को सरकार ने एक वर्ष पहले (अप्रैल 2014) से लागू किया। इसके खिलाफ कंपनियों ने यह कहते हुए चुनौती दी कि पिछले साल की बैलेंस शीट बंद हो चुकी है। पिछली तारीख से भुगतान करने पर अचानक करोड़ों का बोझ पड़ेगा। यह असांविधानिक है।
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