इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया पर बिना किसी का नाम लिए 'द्विअर्थी' (double meaning) शायरी पोस्ट करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता और न ही यह किसी की जमानत रद्द करने का आधार हो सकता है।
यह है मामला
यह मामला एक युवक के खिलाफ दायर की गई याचिका से जुड़ा है। एक युवती ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि युवक की जमानत रद्द कर दी जाए। युवती का आरोप था कि युवक ने सोशल मीडिया पर 'द्विअर्थी' शायरी पोस्ट की है, जो उसे (युवती को) निशाना बनाकर लिखी गई थी।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सोशल मीडिया पर शायरी पोस्ट करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। यदि पोस्ट की गई शायरी में किसी व्यक्ति विशेष के नाम का उल्लेख नहीं है, तो उसे उस व्यक्ति के विरुद्ध मानहानि या धमकी नहीं माना जा सकता। किसी आरोपी द्वारा अपने सोशल मीडिया स्टेटस पर शायरी लगाने मात्र से उसकी जमानत रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि वह सीधे तौर पर अदालती शर्तों का उल्लंघन न करे। शायरी और कविता को अभिव्यक्ति का एक रूप माना गया है। कोर्ट ने माना कि बिना किसी प्रत्यक्ष संदर्भ के इसे किसी को परेशान करने का जरिया नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने जमानत बरकरार रखी
हाई कोर्ट ने इस याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और युवक की जमानत बरकरार रखी। इस फैसले को डिजिटल युग में अभिव्यक्ति का अधिकार के संरक्षण के रूप में देखा जा रहा है।
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