लंदन: अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) ने गौतम अडानी के खिलाफ कथित आपराधिक रिश्वतखोरी मामले में आरोपों को वापस लेने के अपने फैसले का जोरदार बचाव किया है। विभाग ने इसके लिए सबूतों की कमजोरी, क्षेत्राधिकार का उल्लंघन और न्यायिक शक्ति पर संवैधानिक सीमाओं का हवाला दिया है।
"नाम और बदनामी" के लिए दायर किया गया मामला
वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि अडानी और अन्य के खिलाफ कथित मामला केवल "नाम और बदनामी" के लिए दायर किया गया था, जिसका उद्देश्य बिना किसी मुकदमे की संभावना के आरोप लगाना था। साल्वे ने कहा कि मूल अभियोग एक मानक कानूनी कार्यवाही के बजाय एक व्यापक राजनीतिक एजेंडा को दर्शाता है।
भारत को बदनाम करने की कोशिश करते रहते हैं कुछ सीनेटर
साल्वे ने एएनआई को बताया, "मैंने हमेशा यही कहा है, कम से कम मेरा यही मानना था, कि इस मामले का समय ऐसा था जब बाइडेन प्रशासन लगातार भारत विरोधी बयानबाजी कर रहा था। वहां कुछ सीनेटर हैं, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता, जो लगातार भारत को मानवाधिकारों के मामले में बुरा, भ्रष्ट और बदनाम करने की कोशिश करते रहते हैं, और भारत की छवि खराब करने का प्रयास करते हैं। वे भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। मुझे नहीं लगता कि यह कोई रहस्य है। बाइडेन प्रशासन भारत से प्रेम नहीं करता था। इसीलिए वे ऐसा कह रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह 'नाम और बदनामी' की साजिश के तहत दायर किया गया था, ताकि बिना किसी मुकदमे की संभावना के आरोप लगाए जा सकें। यह एक राजनीतिक चाल थी।"
सबूतों की कमी के कारण कमजोर रहा मामला
अमेरिकी न्याय विभाग ने अपने जवाब में कहा कि अभियोजकों को अपने तर्क विस्तार से बताने के लिए मजबूर करने से अभियोजन संबंधी निर्णयों पर संवैधानिक अधिकार कमजोर हो सकता है। अभियोजकों का कहना है कि कथित मामला भारत में हुआ था और अमेरिकी अभियोकों के लिए इसमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं था। अमेरिकी न्याय विभाग ने अपने जवाब में तर्क दिया कि सबूतों की कमी के कारण मामला कमजोर था। उसने आगे कहा कि अधिकांश कथित सबूत भारत में आधारित थे, जिससे अमेरिकी अभियोजन मुश्किल हो गया।
साल्वे ने इस केस को लेकर क्या कहा
कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि न्याय विभाग द्वारा लिए गए कड़े रुख से पीठासीन न्यायाधीश के पास मामले को जीवित रखने की बहुत कम गुंजाइश बचती है। "क्या जज जल्द ही केस बंद कर देंगे? मुझे लगता है उन्हें करना ही पड़ेगा। इसके बाद शायद उन्हें करना ही पड़े। मेरा मतलब है, मुझे नहीं लगता कि वे इसे बंद क्यों नहीं करेंगे," साल्वे ने कहा। "अगर वे केस बंद नहीं करते हैं, तो वे इसे एक बड़े मुद्दे में बदल रहे हैं। मैं यह कहकर अपनी बात खत्म करना चाहूंगा कि संविधान अभियोजन शक्ति को कार्यपालिका में निहित करता है, न्यायपालिका में नहीं। वे जज से कह रहे हैं कि मुकदमा चलाना है या नहीं, यह तय करना हमारा काम है, आपका नहीं।"
अमेरिकी मानक के हिसाब कड़ा बयान: साल्वे
वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी टिप्पणी की, कि अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत को दिए अपने जवाब में जिस लहजे का इस्तेमाल किया, वह अमेरिकी कानूनी संचार की सीधी प्रकृति को ध्यान में रखते हुए भी उल्लेखनीय रूप से दृढ़ था, क्योंकि जज और अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को स्पष्ट रूप से आपत्ति है, जिस तरह से वे अदालतों को संबोधित करते हैं और जिस तरह से वे लिखते हैं, वह इंग्लैंड में हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा से भी बहुत अलग है। भारत में तो यह अंतर और भी अधिक है। अमेरिका अधिक सीधा है। यहां तक कि उनके फैसले भी अधिक सीधी भाषा में होते हैं। इसलिए आपको इसे ध्यान में रखना होगा। अमेरिकी मानक के हिसाब से भी, यह एक बहुत ही कड़ा बयान है।"
इन आरोपों को खारिज करने की अपील भी की गई
साल्वे ने आगे कहा, "उन्होंने यह भी कहा कि वे संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें यह मामला लाना ही नहीं चाहिए था। गौतम अडानी और अन्य के खिलाफ मामले में भारत में सौर ऊर्जा अनुबंधों से जुड़ी रिश्वतखोरी योजना का आरोप लगाया गया था, जिसने कथित तौर पर अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया था। इस साल मई में अमेरिकी न्याय विभाग ने इन आरोपों को खारिज करने की अपील की थी, जिसके बाद न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले की अमेरिकी अदालत ने न्याय विभाग से जवाब मांगा है। उस जवाब से अमेरिकी न्याय विभाग का रुख और मजबूत होने की उम्मीद है, और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जज संभवतः न्याय विभाग के रुख का समर्थन करेंगे।
(एएनआई)
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