प्राइम न्यूज़ – एक कसम, राष्ट्र प्रथम
Breaking News

भारत के तलवार वाले सैनिकों के सामने नाकाम रहा..

भारत के तलवार वाले सैनिकों के सामने नाकाम रहा ओटोमन साम्राज्य का तोपखाना, प्रथम विश्वयुद्ध में बेहद शक्तिशाली था

हाइफा के मेयर योना आहाव ने कहा कि 107 साल पहले हाइफा को अंग्रेजों ने नहीं भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया अभी तक हम गलत पढ़ते आए हैं कि अंग्रेजों ने हाइफा को मुक्त कराया.

भारत के तलवार वाले सैनिकों के सामने नाकाम रहा ओटोमन साम्राज्य का तोपखाना प्रथम विश्वयुद्ध में बेहद शक्तिशाली था

भारत के तलवार वाले सैनिकों के सामने नाकाम रहा ओटोमन साम्राज्य का तोपखाना, प्रथम विश्वयुद्ध में बेहद शक्तिशाली था |

हाइफा के मेयर योना आहाव ने कहा कि 107 साल पहले हाइफा को अंग्रेजों ने नहीं भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया अभी तक हम गलत पढ़ते आए हैं कि अंग्रेजों ने हाइफा को मुक्त कराया. गौरतलब है कि भारतीय सैनिक ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ अंग्रेजों की सेना से लड़ रहे थे. उस समय ओटोमन साम्राज्य का जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी और बुल्गारिया के साथ गठबंधन था. ऐसी स्थिति में भारतीय सैनिकों ने तलवारों और भालों से उसके तोपखाना का मुकाबला किया और हाइफा को मुक्त कराया।  

इतने लंबे समय के बाद इजराइल ने भारतीय सैनिकों की कुर्बानी को याद किया है. प्रथम विश्वयुद्ध का यह वह समय था, जब भारत पर ब्रिटेन का शासन था और ब्रिटेन ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ लड़ रहा था. मेयर ने कहा कि एक दिन एक व्यक्ति उनके घर आय़ा और उसने बताया कि यह गलत पढ़ाया जा रहा है कि हाइफा को अंग्रेजों ने नहीं भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया. उसने बताया कि इस विषय पर उसने काफी शोध किया है. यह भारतीय सैनिक ही थे, जिन्होंने अपनी बहादुरी से पूरे क्षेत्र का नक्शा बदल दिया. मेयर ने कहा कि स्कूल की किताबों में भारतीय सैनिकों के इस योगदान को शामिल किया जाएगा। स्थानीय ऐतिहासिक सोसायटी के शोध के आधार पर यह बदलाव किया जाएगा.

मेजर दलपत सिंह रहे हाइफा के हीरो

शोध में यह बात सामने आई है कि भारतीय सैनिकों ने किस बहादुरी से लड़ाई लड़ी और असंभव को संभव बना दिया. मेजर दलपत सिंह को हाइफा को हीरो कहा जाता है. बहादुरी के लिए उनको मरणोपरांत सम्मानित किया गया। इस युद्ध में भारतीय घुड़सवार सैनिकों ने किलेबंदी जैसे हालात वाले शहर हाइफा पर जिस तरह कब्जा किया वह बेमिसाल है. पूरी दुनिया इस युद्ध को देखकर हैरान थी. इन सैनिकों की बहादुरी ही थी कि हाइफा पर ब्रिटिश और सहयोगी देशों ने कब्जा किया. ब्रिटिश सेना की इंपीरियल कैलिवरी ब्रिगेड ने इस अभियान को पूरा किया था.

पुस्तकों में अब पढ़ाया जाएगा कि किस तरह माउंट कार्मेल की ढलानों से भारतीय सैनिकों ने ओटोमन की तोपखानों और मशीनगनों से लैस सेनाओं को खदेड़कर शहर पर कब्जा किया। अधिकतर इतिहासकार इस अभियान को आखिरी घुड़सवार अभियान कहते हैं। इसमें मैसूर, हैदराबाद, जोधपुर रियासतों से लिए गए घुड़़सवार सैनिक शामिल थे. प्रथम विश्वयुद्ध में 74 हजार से अधिक सैनिकों ने जान गंवाई थी। इनमें से करीब चार हजार जवानों की जान पश्चिम एशिया में गंवाई थी. बहुत से सैनिकों की कब्रें इजराइल, यरुशलम और रामल्ला शहरों के तब्रिस्तानों में सुरक्षित हैं.