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सौरभ किरपाल के गे होने को लेकर विवाद

जस्टिस संजय किशन कौल का दावाः सरकार सौरभ किरपाल को गे होने के कारण जज बनाने को तैयार नहीं

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल के अनुसार, सौरभ किरपाल की दिल्ली हाई कोर्ट में नियुक्ति में देरी की एक वजह उनके समलैंगिक होने को लेकर सरकार की कथित हिचकिचाहट थी।

जस्टिस संजय किशन कौल का दावाः सरकार सौरभ किरपाल को गे होने के कारण जज बनाने को तैयार नहीं

Former Supreme Court Judge Justice Sanjay Kishan Kaul |

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने सीनियर एडवोकेट सौरभ किरपाल को दिल्ली हाई कोर्ट का जज बनाने को लेकर लंबे समय से चल रहे गतिरोध पर बात की।

देश एक गे जज के लिए तैयार नहीं था

ANI से बात करते हुए, जस्टिस कौल ने बताया कि किरपाल के विदेशी पार्टनर को लेकर सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए सार्वजनिक कारणों के बावजूद, असली आपत्ति भारत के पहले खुले तौर पर गे जज को नियुक्त करने में सरकार की हिचकिचाहट से पैदा हुई, जिससे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अंदर अनौपचारिक चर्चाओं और संस्थागत गतिरोधों पर से पर्दा हट गया। सालों की देरी के पीछे की असली वजह पर बात करते हुए, जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, "मुझे लगता है कि असली वजह और जो मुझे इनफॉर्मली बताई गई थी, यह थी कि उनकी सोच थी कि देश एक गे जज के लिए तैयार नहीं है। कॉलेजियम को पहले इसे क्लियर करने में कुछ समय लगा, लेकिन जब मैं कॉलेजियम में था, तो हमें इसे दोहराने या ऐसा करने में कोई मुश्किल नहीं हुई, मेरी अपनी सोच अलग है, जो मेरे हालिया बयान में दिखती है, देश (एक गे जज) को इसलिए स्वीकार कर लेता क्योंकि वह एक अच्छा वकील है।

कॉलेजियम ने दोनों वजहों को किया खारिज

वह एकेडमिकली ओरिएंटेड वकील भी है, मुझे लगता है कि उसका न होना एक नुकसान था। उसने जज बनने के लिए अपनी मंज़ूरी कभी वापस नहीं ली। सरकार ने इसे कभी क्लियर नहीं किया, और कॉलेजियम ने इसे कभी खारिज नहीं किया क्योंकि कॉलेजियम के लिए इसे खारिज करना बहुत शर्मनाक होता।" 19 जनवरी, 2023 को, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपने प्रस्ताव और सरकार की आपत्तियों को पब्लिक में रखने का एक अनोखा कदम उठाया। कॉलेजियम ने दोनों वजहों को खारिज कर दिया, और साफ तौर पर कहा कि किरपाल का खुले तौर पर गे होना क्रेडिट की बात है और यह उन्हें किसी ऊंचे संवैधानिक पद पर रहने के लिए अयोग्य नहीं बनाता।

LGBTQ+ अधिकारों को वकालत में शामिल

क्योंकि कॉलेजियम ने औपचारिक रूप से सिफारिश को दोहराया था, इसलिए स्थापित नियमों के तहत, एग्जीक्यूटिव इसे कानूनी तौर पर मानने के लिए बाध्य था। हालांकि, न तो फाइल को मंजूरी दी गई और न ही दोहराने के बाद इसे खारिज किया गया, जिससे नियुक्ति संस्थागत अधर में लटकी रही। अक्टूबर 2017 में दिल्ली HC कॉलेजियम ने सिफारिश की, नवंबर 2021 में SC कॉलेजियम ने मंजूरी दी, नवंबर 2022 में केंद्र ने वापस कर दिया, और 19 जनवरी, 2023 को SC कॉलेजियम ने इसे दोहराया। कानून मंत्रालय के अप्रैल 2021 के पत्र में किरपाल के पार्टनर के स्विस नागरिक होने और LGBTQ+ अधिकारों की वकालत में उनके शामिल होने को साफ तौर पर बताया गया था।

कॉलेजियम ने कभी भी रिकमेंडेशन वापस नहीं ली

किरपाल ने कई सालों की रुकावट के दौरान अपनी सहमति बनाए रखी, और अपने न्यायिक कार्यकाल में कितना भी समय बचा हो, नियुक्ति को स्वीकार करने की इच्छा जताई। जस्टिस कौल ने आगे कहा कि किरपाल ने जज बनने के लिए अपनी मंज़ूरी कभी वापस नहीं ली, जबकि सरकार ने कभी उनके अपॉइंटमेंट को मंज़ूरी नहीं दी और कॉलेजियम ने कभी भी रिकमेंडेशन वापस नहीं ली। उन्होंने कहा, “उन्होंने जज बनने के लिए अपनी मंज़ूरी कभी वापस नहीं ली। सरकार ने इसे कभी मंज़ूरी नहीं दी और कॉलेजियम ने इसे कभी रद्द नहीं किया क्योंकि कॉलेजियम के लिए इसे रद्द करना बहुत शर्मनाक होता।”

इस वैकेंसी को 62 साल की उम्र तक बनाए रखेंगे

किरपाल के साथ अपनी बातचीत को याद करते हुए, जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने उनसे बार-बार कहा था कि यह वैकेंसी उनके 62 साल के होने तक खुली रहेगी, क्योंकि किरपाल अपने समुदाय के सपोर्ट के लिए जो भी उम्र दी जाएगी, उसे स्वीकार करने को तैयार थे। जस्टिस कौल ने कहा, “तो मैंने उनसे कहा, मैंने कई बार दोहराया, कि देखिए, आप इस वैकेंसी को 62 साल की उम्र तक बनाए रखेंगे क्योंकि उन्हें लगा कि उनके समुदाय के सपोर्ट के लिए जो भी उम्र दी जाएगी, वह उसे स्वीकार करने को तैयार होंगे।”

(इनपुटः ANI)

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