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योगिनी एकादशी का महत्व और शुभ समय

योगिनी एकादशी 2026: सुख-समृद्धि और पापों से मुक्ति का पावन व्रत, जानें महत्व व शुभ मुहूर्त

योगिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, जो श्रद्धालुओं के लिए सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक शांति की कामना से रखा जाता है।

योगिनी एकादशी 2026 सुख-समृद्धि और पापों से मुक्ति का पावन व्रत जानें महत्व व शुभ मुहूर्त

Yogini Ekadashi 2026 |

नई दिल्ली,(भारत)। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और इनमें से आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की 'योगिनी एकादशी' को बेहद फलदायी माना गया है। इस वर्ष योगिनी एकादशी 10 एवं 11 जुलाई को मनाया जाएगा।

योगिनी एकादशी व्रत का विशेष फल

मान्यता है, कि जो भी श्रद्धालु इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। पद्म पुराण के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

व्रत का शुभ मुहूर्त और तिथि

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई को रात 1 बजकर 32 मिनट पर आरंभ होगा और समापन 11 जुलाई को रात 11 बजकर 06 मिनट पर होगा। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को यवचूर्ण से किया जाएगा।

धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा

यह व्रत न सिर्फ मानसिक और शारीरिक शुद्धि देता है, बल्कि जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित भी करता है। इस व्रत की कथा अलकापुरी के राजा कुबेर और उनके सेवक हेममाली से जुड़ी है। हेममाली अपनी पत्नी के प्रेम में इतना मग्न हो गया कि वह राजा कुबेर की पूजा के लिए मानसरोवर से फूल लाना भूल गया। इस पर क्रोधित होकर कुबेर ने उसे कोढ़ी होने और स्वर्ग से निष्कासित होने का श्राप दे दिया। दुखों से घिरे हेममाली ने भटकते हुए महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम में शरण ली। महर्षि ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। इस व्रत के प्रभाव से हेममाली का कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया और उसे अपना पुराना स्वरूप तथा पत्नी का साथ वापस मिल गया।

कैसे की जाती है पूजा? (पूजा विधि)

योगिनी एकादशी के दिन श्रद्धालु सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं। इसके बाद पीले वस्त्र धारण कर भगवान श्रीहरि विष्णु एवं भगवती एकादशी के समक्ष व्रत का संकल्प लेते है।

पूजा सामग्री: भगवान विष्णु और माता एकादशी को पीले फूल, पीला चंदन, अक्षत, धूप, दीप और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित किया जाता है।

भोग: विष्णु जी को सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है, जिसमें तुलसी का पत्ता अनिवार्य रूप से रखा जाता है।

मंत्र जाप: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जाप किया जाता है।

रात्रि जागरण: इस दिन रात्रि जागरण का भी विशेष महत्व है। श्रद्धालु रात भर भजन-कीर्तन कर भगवान की आराधना करते हैं।

दान-पुण्य का विशेष संयोग

मान्यता है, योगिनी एकादशी पर दान करने से अनंत फल मिलता है। इस दिन देश भर के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जाती है। लोग व्रत की कथा सुनते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, जल, वस्त्र इत्यादि दान करते हैं।

विशेष नोट: एकादशी व्रत के नियमों के अनुसार, इस दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है। साथ ही व्रत रखने वाले और परिवार के अन्य सदस्यों को भी तामसिक भोजन और कटु वचनों से दूर रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

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