WHO दक्षिण-पूर्व एशिया के विशेषज्ञों ने पारा युक्त दंत भराव खत्म करने और सुरक्षित, टिकाऊ मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया।
बैंकॉक: डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया के स्वास्थ्य और पर्यावरण नीति निर्माताओं तथा विशेषज्ञों ने पारा युक्त दंत भराव (डेंटल अमलगम) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और सुरक्षित एवं टिकाऊ मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए सहयोग मजबूत करने का संकल्प लिया है।
दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन
डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में दंत अमलगम को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय की प्रभारी अधिकारी डॉ. कैथरीना बोहेम ने कहा, "दंत अमलगम को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और जन-केंद्रित मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।"
2034 तक डेंटल अमलगम खत्म करने का लक्ष्य
यह कार्यशाला 2025 में पारे पर मिनामाटा कन्वेंशन के छठे सम्मेलन में लिए गए उस ऐतिहासिक निर्णय के बाद आयोजित की गई, जिसमें 2034 तक पारा युक्त डेंटल अमलगम को पूरी तरह चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का लक्ष्य तय किया गया था। अब सदस्य देश इस प्रतिबद्धता को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
पारा बना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पारे को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक चिंता वाले 10 रसायनों में शामिल किया है। डेंटल अमलगम के निर्माण, उपयोग, हटाने और निपटान के दौरान पारा हवा, पानी और मिट्टी में फैलकर पर्यावरण को प्रदूषित कर सकता है। यूएनईपी के अनुसार, वर्तमान में दुनिया भर में डेंटल फिलिंग में 3,000 से 5,000 मीट्रिक टन पारा मौजूद है।
पारा-मुक्त विकल्पों पर जोर
डेंटल अमलगम से दूरी बनाना मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक बदलाव का हिस्सा है। डब्ल्यूएचओ की वैश्विक मौखिक स्वास्थ्य कार्य योजना 2023-2030 और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्य योजना 2022-2030 प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुरक्षित, प्रभावी और पारा-मुक्त विकल्पों को बढ़ावा देने पर जोर देती हैं।
2030 तक तय किए गए लक्ष्य
डब्ल्यूएचओ का लक्ष्य है कि 2030 तक 90 प्रतिशत देशों में डेंटल अमलगम के उपयोग को कम करने या पूरी तरह समाप्त करने के उपाय लागू हो जाएं। हालांकि, 2024 के आंकड़ों के अनुसार दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के केवल 19 प्रतिशत देश ही इस दिशा में लक्ष्य हासिल कर पाए हैं, जबकि वैश्विक औसत 31 प्रतिशत है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण के बीच साझेदारी जरूरी
यूएनईपी के रसायन एवं प्रदूषण क्षेत्र के क्षेत्रीय समन्वयक सुधीर ने कहा कि मिनामाटा कन्वेंशन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य और पर्यावरण क्षेत्रों के बीच मजबूत साझेदारी बेहद जरूरी है। इससे पारा-मुक्त मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारा युक्त कचरे के सुरक्षित प्रबंधन को भी मजबूती मिलेगी।
थाईलैंड बना सफल उदाहरण
यह कार्यशाला जीईएफ-7 फेजिंग डाउन डेंटल अमलगम परियोजना के तहत आयोजित की गई, जो 2023 से 2026 तक चलेगी। थाईलैंड इस परियोजना के तीन पायलट देशों में शामिल है और वहां डेंटल अमलगम के उपयोग में उल्लेखनीय कमी, पारा-मुक्त विकल्पों को बढ़ावा तथा कचरा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
क्षेत्रीय सहयोग पर रहेगा फोकस
दो दिवसीय कार्यशाला में नीति निर्माता, तकनीकी विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय संगठन, शिक्षाविद, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और विकास साझेदार भाग ले रहे हैं। इसमें पारा-मुक्त मौखिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने, वित्तपोषण, आपूर्ति श्रृंखला, कार्यबल विकास और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी। सदस्य देश अपने राष्ट्रीय अनुभव साझा करेंगे और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के उपायों पर विचार करेंगे।
ANI
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