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बस्तर के 'नेचुरल ग्रीनहाउस' को वैज्ञानिक मुहर

खेती में बस्तर की बड़ी क्रांति! प्लास्टिक पॉलीहाउस फेल, 'नेचुरल ग्रीनहाउस' को देश के टॉप साइंस जर्नल ने सराहा

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में विकसित बहुचर्चित 'नेचुरल ग्रीनहाउस' मॉडल' पर आधारित शोध भारत के प्रतिष्ठित साइंस जर्नल Current Horticulture के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है।

खेती में बस्तर की बड़ी क्रांति प्लास्टिक पॉलीहाउस फेल नेचुरल ग्रीनहाउस को देश के टॉप साइंस जर्नल ने सराहा

Bastar’s Eco-Greenhouse Outperforms Plastic Polyhouse |

रायपुर (छत्तीसगढ़)। कई दशकों तक आतंकवाद का डांस झेलने के बाद इन दोनों बस्तर से अच्छी खबरें आने की शुरुआत शुरू हो गई है। वर्तमान खबर बस्तर या छत्तीसगढ़ के लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारत तथा विश्व की खेती-किसानी तथा पर्यावरण के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण, सकारात्मक और हर्षवर्धक खबर है। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में विकसित बहुचर्चित 'नेचुरल ग्रीनहाउस' मॉडल' को उस समय बड़ी वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त हुई, जब इस पर आधारित शोध भारत के प्रतिष्ठित साइंस जर्नल Current Horticulture के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ। यह शोध डॉ. राजाराम त्रिपाठी द्वारा लगभग 25 वर्षों के सतत अनुसंधान, प्रयोग और व्यावहारिक अनुभव का परिणाम है।

प्रतिष्ठित साइंस जर्नल में मिली जगह

Current Horticulture का प्रकाशन सोसायटी फॉर हॉर्टिकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (SHRD), भारत द्वारा किया जाता है। यह देश के उद्यानिकी एवं कृषि विज्ञान के प्रतिष्ठित शोध मंचों में से एक है। यहां भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) सहित अनेक राष्ट्रीय संस्थानों के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की सक्रिय सहभागिता रहती है। ऐसे प्रतिष्ठित साइंस जर्नल में किसी तकनीक का प्रकाशित होना केवल शोध प्रकाशित होना नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिक परीक्षण, तकनीकी समीक्षा और उपयोगिता को वैज्ञानिक समुदाय द्वारा स्वीकार किए जाने का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

जलवायु परिवर्तन से लड़ेगा नया इकोसिस्टम

डॉ. त्रिपाठी का नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल प्राकृतिक वृक्षों के माध्यम से ऐसा सूक्ष्म पारिस्थितिक तंत्र (Micro Ecosystem) विकसित करता है, जो खेती को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से बचाने में सहायक माना जा रहा है। यही कारण है कि इसे भविष्य की टिकाऊ कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण नवाचार के रूप में देखा जा रहा है।

पॉलीहाउस से बेहद सस्ता और मुनाफेदार विकल्प

यह मॉडल पारंपरिक प्लास्टिक पॉलीहाउस का कम लागत वाला, पर्यावरण अनुकूल और दीर्घकालिक विकल्प प्रस्तुत करता है। यहां एक एकड़ पॉलीहाउस की स्थापना में लगभग 40 लाख रुपये तक की लागत आती है। वहीं नेचुरल ग्रीनहाउस मात्र एक से डेढ़ लाख रुपए में अर्थात अपेक्षाकृत बहुत कम लागत में ही तैयार किया जा सकता है। इतना ही नहीं, समय के साथ इसमें विकसित वृक्ष स्वयं एक मूल्यवान जैविक संपदा का रूप ले लेते हैं। लगभग 10 वर्षों में डेढ़ से 2 करोड़ तक की बहुमूल्य लकड़ी और बायोमास प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं यह लगभग 6 टन बेशकीमती ग्रीन मैन्योर यानी हरी खाद भी हर साल प्रदान करते हैं। सबसे अच्छी बात है कि इसमें लगाए गए पेड़ों के ऊपर काली मिर्च जैसी लताओं को चढ़कर एक एकड़ से हर साल 5 से 10 लख रुपए तक की अतिरिक्त आमदनी पैदा की जा सकती है।

वर्टिकल फार्मिंग: 1 एकड़ में 50 एकड़ जैसा उत्पादन

दरअसल इस मॉडल में जलवायु तथा नाविक को नियंत्रित करने वाले विशेष तरह के पौधे विशेष तकनीक से आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग दूरियों पर लगाए जाते हैं। इन पेड़ों पर काली मिर्च के पौधे पेड़ों की जड़ों के पास लगाकर काली मिर्च की लताओं को इन पेड़ों पर चढ़ाया जाता है। दो-तीन साल बाद यह बताएं काली मिर्च देने लगती है और पेड़ों पर लगभग 70 से 100 फीट की ऊंचाई तक चढ़ जाती है और पूरी ऊंचाई तक काली मिर्च‌के गुच्छे फलते हैं। यानी इस वर्टिकल खेती में एक एकड़ जमीन की उत्पादक क्षमता 50 गुना तक बढ़ जाती है। यानी एक एकड़  जमीन को हम इस मॉडल से 50 एकड़ के बराबर उत्पादन देने वाला बना सकते हैं।

छोटे किसानों की तकदीर बदलेगा यह मॉडल

भारत जैसे देश में जहां कृषि जोत सीमा बहुत कम है और लगभग 85% किसानों के पास चार एकड़ से भी कम जमीन है । ऐसी विकट स्थिति में यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने और देश की उत्पादक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस मॉडल की विशेषताएं केवल संरक्षित खेती तक सीमित नहीं है। इसमें वर्षाजल संरक्षण, वायुमंडलीय नाइट्रोजन के प्राकृतिक स्थिरीकरण, बड़ी मात्रा में हरित खाद एवं जैविक बायोमास उत्पादन, मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि, कार्बन संरक्षण तथा एक साथ कई फसलों की खेती जैसी अनेक विशेषताएं समाहित हैं। इससे खेती की लागत घटाने और किसानों की आय बढ़ाने की नई संभावनाएँ उत्पन्न होती हैं।

डॉ. त्रिपाठी का एक और राष्ट्रीय धमाका

उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिक स्वीकृति मिलने से पहले ही यह मॉडल अनेक राज्यों के प्रगतिशील किसानों के बीच लोकप्रिय हो चुका था। अब प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मंच पर प्रकाशित होने के बाद इसकी तकनीकी विश्वसनीयता और वैज्ञानिक स्वीकार्यता को और अधिक बल मिला है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रकृति आधारित कृषि प्रणालियों पर नए सिरे से गंभीर वैज्ञानिक विमर्श को गति मिलेगी। डॉ. राजाराम त्रिपाठी इससे पूर्व 'मां दंतेश्वरी ब्लैक पेपर-16 (MDBP-16)' जैसी उच्च उत्पादक काली मिर्च की विकसित किस्म के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं। उनकी विकसित यह किस्म दक्षिण भारत के बाहर भी अनेक राज्यों में सफलतापूर्वक उगाई जा रही है और अधिक उत्पादन क्षमता के कारण किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।

बस्तर के जनजातीय ज्ञान से चमकेगी वैश्विक खेती

अपनी इस उपलब्धि पर डॉ. त्रिपाठी ने इसका श्रेय मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर, अपने सहयोगियों, परिवार, बस्तर की माटी तथा जनजातीय समाज के पारंपरिक ज्ञान को दिया। उन्होंने कहा कि यदि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में खेती और मानवता दोनों को सुरक्षित रखना है, तो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाले ऐसे टिकाऊ कृषि मॉडल ही भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेंगे। बस्तर की धरती से निकला यह नवाचार अब केवल एक स्थानीय प्रयोग नहीं रहा, बल्कि देश की वैज्ञानिक बिरादरी की स्वीकृति प्राप्त एक ऐसा मॉडल बन चुका है, जो आने वाले समय में भारत ही नहीं, विश्व की टिकाऊ कृषि व्यवस्था के लिए भी नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
​(Published By: Ravi Pandey)

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