खर्मोर अभयारण्य ने अपने संरक्षित क्षेत्र का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा खो दिया है, क्योंकि एक सरकारी आदेश के तहत इसके क्षेत्रफल को 348.12 वर्ग किलोमीटर से घटाकर केवल 132.83 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है।
धार। जिले में स्थित खर्मोर अभयारण्य ने अपने संरक्षित क्षेत्र का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा खो दिया है, क्योंकि एक सरकारी आदेश के तहत इसके क्षेत्रफल को 348.12 वर्ग किलोमीटर से घटाकर केवल 132.83 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है। इस कमी के कारण लगभग 216 वर्ग किलोमीटर भूमि अब संरक्षण नियंत्रण से बाहर हो गई है, जिससे क्रिटिकलली एनडेंजर्ड (बहुत अधिक संकटग्रस्त) किस्म की पक्षी ‘लेस्सर फ्लोरिकन’ के संरक्षण के प्रयास प्रभावित होंगे, जिसकी संख्या देश में घटती जा रही है। वन विभाग की अधिसूचना ने 1983 के मूल आदेश में संशोधन किया है, जिसके तहत वाइल्डलाइफ़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के अंतर्गत पहले संरक्षित इलाके अब मानवीय गतिविधियों और विकास के लिए खोल दिए गए हैं। अधिसूचना के अनुसार गुमानपुरी, बिमरोद, पिपरनी, सियादव और अमोडिया सहित 14 गांवों को अभयारण्य के सीमांकन से बाहर कर दिया गया है।
भूमि उपयोग प्रतिबंध हटा-
संरक्षण हटने के कारण पिछले 22 वर्षों से लागू भूमि उपयोग प्रतिबंध भी हटा दिए गए हैं, जिससे अब इन इलाकों में निर्माण, भूमि लेन-देन और व्यावसायिक गतिविधियाँ संभव हो सकेंगी। जो इलाके कभी पक्षी के लिए बफर ज़ोन का काम करते थे, अब वे भी विकास के लिए खोले जा रहे हैं।
कई आधारभूत योजना का रास्ता हुआ साफ-
इस फैसले से कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को भी आगे बढ़ने का रास्ता मिल गया है। इंदौर-दाहोद रेल प्रोजेक्ट और सरदारपुर-पेतलवाड़ मार्ग, जो पहले अभयारण्य प्रतिबंधों के कारण अटके हुए थे, अब आगे बढ़ सकते हैं।
मिल रही है आर्थिक राहत-
एक किसान ने कहा कि अब उन्हें आर्थिक राहत मिल रही है क्योंकि वे अब अपनी भूमि को बेचना या उसका अन्य उपयोग करना चाहते थे, लेकिन पूर्व में ऐसा नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने बताया कि आसपास की भूमि की कीमत करोड़ों में थी, लेकिन उनकी अपनी भूमि का कोई बाज़ार नहीं था, क्योंकि उस पर सिर्फ खेती के अलावा कोई इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था।
पक्षियों को आवास संकट-
किसान ने यह भी कहा कि “पिछले कुछ वर्षों में अभयारण्य में खर्मोर पक्षी मुश्किल से ही देखा गया है।” लेस्सर फ्लोरिकन, जो मानसून के समय अपने जोड़े दिखाने के रंगीन प्रदर्शन के लिए जाना जाता है, पश्चिमी और मध्य भारत के घास के मैदानी आवासों में लगातार अपनी जगह खो रहा है। इस प्रजाति को बहुत अधिक संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है और इसका संकट मुख्यतः आवास के नुकसान के कारण बढ़ा है।
खर्मोर संरक्षण के लिए अपनाए जाएंगे नये तरीके-
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि संरक्षण अब एक अलग दृष्टिकोण से जारी रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि नए अभयारण्य क्षेत्र में खर्मोर संरक्षण के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएंगे और संशोधित मुख्य क्षेत्र के चारों ओर एक इको-संवेदनशील ज़ोन (Eco-Sensitive Zone) स्थापित किया जाएगा। भविष्य में संरक्षण प्रयास बचे हुए संरक्षित क्षेत्र की सरकारी भूमि पर केंद्रित होंगे।
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