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लड़कियों की शिक्षा संकट में

पाकिस्तान के शिक्षा संकट में अब भी पिछड़ रही हैं लड़कियां

दिर अपर में बार-बार सरकारी आश्वासनों के बावजूद 2026 में भी लड़कियों के लिए समान शिक्षा का सपना हकीकत से कोसों दूर है।

पाकिस्तान के शिक्षा संकट में अब भी पिछड़ रही हैं लड़कियां

Girls still left behind in Pakistan's education crisis |

खैबर पख्तूनख्वा (पाकिस्तान)। दिर अपर में बार-बार सरकारी आश्वासनों के बावजूद 2026 में भी लड़कियों के लिए समान शिक्षा का सपना हकीकत से कोसों दूर है। सरकारी आंकड़े स्कूल तक पहुंच में, खासकर उच्च स्तर पर, लिंग के आधार पर भारी असमानता दिखाते हैं। इससे लंबे समय तक चलने वाले सामाजिक और आर्थिक परिणामों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

स्कूलों में भारी असमानता, आंकड़े दिखाते हैं सच्चाई

स्थानीय मीडिया 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के मुताबिक आंकड़ों से पता चलता है कि जिले के 1,017 स्कूलों में से केवल 310 स्कूल लड़कियों के लिए हैं, जिनमें सिर्फ 64,892 छात्राएं पढ़ती हैं। इसके विपरीत, 707 लड़कों के या मिश्रित संस्थानों में 141,000 से अधिक छात्र पढ़ते हैं, जिनमें कुछ लड़कियां भी शामिल हैं। यह असंतुलन तब भी बना हुआ है, जबकि जिले की 1.08 मिलियन आबादी में महिलाओं की संख्या आधे से भी ज़्यादा है।

कॉलेज स्तर पर और गहराता अंतर, नई घोषणाएं भी अधूरी

कॉलेज स्तर पर यह अंतर और भी बढ़ जाता है। लड़कों के लिए चार डिग्री कॉलेज हैं जबकि लड़कियों के लिए केवल एक। राजनीतिक नेताओं ने हाल ही में लारजम-दारोरा और अशेरी दारा में लड़कियों के लिए दो नए कॉलेजों के निर्माण हेतु 139.9 मिलियन रुपये की फंडिंग की घोषणा की है। सांसदों ने इस पहल को एक क्रांतिकारी कदम बताया है। हालांकि, पहले से स्वीकृत कई परियोजनाएं अभी भी अधूरी पड़ी हैं। इनमें PK-12 क्षेत्र में लड़कियों के लिए बनने वाला एक कॉलेज भी शामिल है। सभी निर्वाचन क्षेत्रों में हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों तक पहुंच के मामले में लड़कों की संख्या लगातार लड़कियों से ज़्यादा बनी हुई है।

बाढ़ और खराब ढांचे ने शिक्षा को किया और मुश्किल

बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां इस समस्या को और भी गंभीर बना देती हैं। वर्ष 2010 और 2022 में आई बाढ़ के कारण कई स्कूल तबाह हो गए थे, जिनका पुनर्निर्माण अभी तक नहीं हो पाया है। इसके चलते बच्चों को खुले आसमान के नीचे पढ़ाई करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कलकोट और कुमरात घाटी जैसे दूरदराज के इलाकों में, लड़कियों के लिए मिडिल या हाई स्कूल लगभग न के बराबर हैं। इससे प्राथमिक शिक्षा के बाद उनकी आगे की पढ़ाई की राह और भी मुश्किल हो जाती है।

भीड़भाड़ और संसाधनों की कमी से बिगड़ता माहौल

अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि पहले अपनाई गई वे नीतियां, जिनका मुख्य उद्देश्य नामांकन (दाखिलों) को बढ़ाना था, सामुदायिक स्तर पर चलाई गई पहलों और बेहतर निगरानी के माध्यम से शिक्षा तक पहुंच को बेहतर बनाने में मददगार साबित हुई थीं। लेकिन, अब केवल ये उपाय ही पर्याप्त नहीं रह गए हैं। कक्षाओं में क्षमता से अधिक छात्रों का होना, फर्नीचर की कमी और जगह का अभाव- ये सभी कारक मिलकर पढ़ाई के माहौल को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। इसके चलते आज भी कई छात्रों को ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।

सामाजिक बाधाएं और कमजोर नीतियां बढ़ा रही हैं खाई

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस समस्या की जड़ में कुछ गहरी संरचनात्मक बाधाएं हैं- जैसे कि सामाजिक रीति-रिवाज, कम उम्र में विवाह, महिला शिक्षकों की कमी और आवागमन के लिए खराब सुविधाएं। ये सभी कारक मिलकर लड़कियों की शिक्षा पर कहीं अधिक प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। यदि बुनियादी ढांचे में तत्काल निवेश नहीं किया गया और शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत प्रतिबद्धता को निरंतर बनाए नहीं रखा गया तो शिक्षा के क्षेत्र में मौजूद यह लैंगिक असमानता (जेंडर गैप) और भी अधिक बढ़ सकती है।

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