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जापान बनाएगा पहली सेंट्रलाइज़्ड खुफिया एजेंसी

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली केंद्रीय खुफिया एजेंसी बनाने की तैयारी में जापान, चीन-रूस-उत्तर कोरिया बने बड़ी चिंता

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान पहली बार सेंट्रलाइज़्ड इंटेलिजेंस एजेंसी बनाने की एक बड़ी कोशिश कर रहा है। इसको लेकर वह अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे सहयोगियों से सलाह ले रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली केंद्रीय खुफिया एजेंसी बनाने की तैयारी में जापान चीन-रूस-उत्तर कोरिया बने बड़ी चिंता

Japanese Prime Minister Sanae Takaichi |

वॉशिंगटन (अमेरिका)। जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपनी पहली सेंट्रलाइज़्ड इंटेलिजेंस एजेंसी बनाने की एक बड़ी कोशिश कर रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन, रूस और उत्तर कोरिया से बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच, जापान अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे पश्चिमी सहयोगियों से सलाह ले रहा है।

प्रस्तावित एजेंसी के लिए अमेरिकी इंटेलिजेंस अधिकारियों से सीक्रेट चर्चा

NYT के मुताबिक प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की सरकार ने हाल के महीनों में प्रस्तावित इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए टेक्नोलॉजी, स्टाफिंग और ऑपरेशनल प्राथमिकताओं जैसे मुद्दों पर अपने सहयोगियों से निजी तौर पर बातचीत की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के इंटेलिजेंस अधिकारियों ने साइबर डिफेंस सिस्टम, औद्योगिक जासूसी का मुकाबला करने और जापान में काम कर रहे विदेशी निवेश और एजेंटों की जांच-पड़ताल को मज़बूत करने के बारे में जानकारी दी है।

जापानी मिशन में शामिल हुए जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया, साझा की रणनीतियां

न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी भी इन चर्चाओं में शामिल हो गया है। देश की विदेशी खुफिया एजेंसी (BND) के प्रमुख ने हाल ही में टोक्यो का दौरा किया, ताकि प्रस्तावित एजेंसी और दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने के तरीकों को बेहतर बनाने पर चर्चा की जा सके। 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया ने जापान को टेक्नोलॉजी के साथ-साथ सरकारी मंत्रालयों के बीच तालमेल बेहतर बनाने और इंटेलिजेंस शेयरिंग को बढ़ावा देने की रणनीतियों के बारे में सलाह दी है।

बिखरे हुए इंटेलिजेंस सिस्टम को एकजुट करने की कोशिश

न्यूज रिपोर्ट में बताया गया है कि जापान का इंटेलिजेंस सिस्टम पारंपरिक रूप से बिखरा हुआ रहा है, जिसमें रक्षा अधिकारी, राजनयिक, पुलिस और अन्य एजेंसियां ​​अलग-अलग जानकारी इकट्ठा और उसका विश्लेषण करती रही हैं। इससे तालमेल की कमी रहती है और देश जासूसी और विदेशी दखल के प्रति संवेदनशील बना रहता है। प्रस्तावित एजेंसी, प्रधानमंत्री तकाइची की जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है, क्योंकि टोक्यो को चीन, रूस और उत्तर कोरिया से बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव और चीनी दुष्प्रचार का मुकाबला

न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा है कि तकाइची ने हथियारों के निर्यात पर लगी पाबंदियां पहले ही हटा दी हैं और युद्ध के बाद जापान की सबसे बड़ी रक्षा क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। उनकी सरकार अब अहम टेक्नोलॉजी की सुरक्षा को मज़बूत करने और विदेशी प्रभाव वाली गतिविधियों—खासकर चीन से जुड़ी गतिविधियों का मुकाबला करने की कोशिश कर रही है। न्यूज रिपोर्ट में सिटिजन लैब के रिसर्चर्स के हवाले से कहा गया है कि चीन ने बीजिंग समर्थक दुष्प्रचार फैलाने के लिए जापानी भाषा के न्यूज आउटलेट जैसा दिखने वाली वेबसाइटें बनाई हैं।

पीएम तकाइची का बड़ा दांव, हालांकि सरकार ने साधी चुप्पी

जापान में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत और नेशनल इंटेलिजेंस के पूर्व डायरेक्टर जनरल एंड्रयू शीरर ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि जापानी अधिकारियों का मानना ​​है कि देश की इंटेलिजेंस क्षमताएं दशकों से एक ही जगह पर रुकी हुई हैं। उन्होंने कहा, "यह एक बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री ने इसे प्राथमिकता दी है और इसे पूरा करने के लिए अपनी राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल कर रही हैं।" न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, जापानी सरकार ने इस बात पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि क्या वह एजेंसी बनाने के लिए विदेशी सरकारों से मदद मांग रही है। उसने बस इतना कहा कि वह संबंधित देशों में अपने समकक्षों के साथ नियमित रूप से करीबी सहयोग बनाए रखती है।
(यह खबर ANI से सीधे संपादित की गई है।)

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