भारत ने बहुपक्षवाद को भविष्य के लिए उपयुक्त बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में व्यापक बदलाव का आह्वान किया।
न्यूयॉर्क: भारत ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में व्यापक सुधारों की अपनी मांग दोहराई। इसके साथ ही बहुपक्षवाद को भविष्य के लिए उपयुक्त बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार, महासभा को पुनर्जीवित करने और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) की भूमिका को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया।
भविष्य के लिए समझौते की समीक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा की अनौपचारिक बैठक के दौरान 'बहुपक्षवाद को भविष्य के लिए उपयुक्त बनाना' जैसे विषय पर मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत हरीश परवथानेनी ने कहा, भारत के लिए बहुपक्षवाद को भविष्य के लिए उपयुक्त बनाने की शुरुआत यह सुनिश्चित करने से होती है कि वैश्विक संस्थाएं समकालीन वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करें। यह सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार, महासभा को पुनर्जीवित करने, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय- इन आयामों में सतत विकास को आगे बढ़ाने में ईसीओएसओसी की मजबूत भूमिका की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
क्या है संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मूल सिद्धांत
संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर चिंता जताते हुए परवथानेनी ने कहा कि हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र के बारे में जनता की धारणा में प्रतिकूल बदलाव आया है, जिसका मुख्य कारण विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संघर्षों में सार्थक हस्तक्षेप करने में सुरक्षा परिषद की असमर्थता है। सुरक्षा परिषद प्रभावित आबादी के बीच मानवीय पीड़ा को समाप्त करने में अप्रभावी रही है। इसलिए, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मूल सिद्धांत- अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना- सवालों के घेरे में आ गया है।
कार्रवाई बिंदु 39 से 41 काफी हद तक कागजों पर ही रह गए
उन्होंने तर्क दिया कि परिषद की कमियां इसकी पुरानी संरचना के कारण हैं। सुरक्षा परिषद की कमियों का मूल कारण स्पष्ट है। 1940 के दशक के लिए तैयार की गई अस्सी साल पुरानी संरचना समकालीन चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ है। संयुक्त राष्ट्र एक संगठन के रूप में सुरक्षा परिषद में सुधार लाने में कोई खास प्रगति नहीं कर पाया है। अब तक की चर्चाएं अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) ढांचे के तहत तैयार बयानों के अंतहीन चक्र तक ही सीमित रही हैं। कार्रवाई बिंदु 39 से 41 काफी हद तक कागजों पर ही रह गए हैं। यह अस्वीकार्य है और इसमें बदलाव होना चाहिए।
भारत रचनात्मक भावना से समझौते का करता है समर्थन
भविष्य के समझौते का जिक्र करते हुए भारतीय राजदूत ने कहा कि अंतर-सरकारी वार्ता (IGN) पर कार्रवाई बिंदु तत्कालीन IGN सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार किए गए थे, न कि समझौते के सह-सुविधाकर्ताओं द्वारा। उन्होंने कहा कि भारत को उन प्रावधानों पर महत्वपूर्ण आपत्तियां हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि भारत रचनात्मक भावना से समझौते का समर्थन करता है।
परवथानेनी ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में सुधारों का आह्वान करते हुए कहा, कि पर्याप्त, किफायती और पूर्वानुमानित वित्तपोषण सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपरिहार्य है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को अपने दायित्वों को निभाते हुए अधिक प्रतिनिधि, उत्तरदायी और विकासोन्मुखी बनना चाहिए।
वैश्विक शासन सुधारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया
वैश्विक शासन सुधारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए उन्होंने कहा, भारत इस बात पर जोर देता है कि हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों सहित वैश्विक शासन संस्थानों में सुधारों को लागू करने के सभी वास्तविक प्रयासों का समर्थन करना जारी रखेंगे। हमारा संयुक्त प्रयास इन संस्थानों को उद्देश्यपूर्ण बनाने और मानवता की वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाने का होना चाहिए।
(एएनआई)
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