दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका पर नोटिस जारी किया।
नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में सुजान सिंह पार्क (उत्तर) संपत्ति को लेकर भूमि एवं विकास कार्यालय (एल एंड डीओ) द्वारा लोक परिसर (अवैध कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत शुरू की गई बेदखली की कार्यवाही को चुनौती दी गई है।
अंतरिम राहत देने से कोर्ट का इनकार
हालांकि, उच्च न्यायालय ने एस्टेट ऑफिसर के समक्ष चल रही कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह एस्टेट ऑफिसर के समक्ष चल रही कार्यवाही में भाग लेता रहे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि एस्टेट ऑफिसर मामले को अनुचित जल्दबाजी में आगे बढ़ा रहे हैं और कंपनी को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा है। यह भी तर्क दिया गया कि क्षेत्राधिकार सहित प्रारंभिक आपत्तियों पर फैसला किए बिना कार्यवाही आगे बढ़ाई जा रही है।
केंद्र सरकार ने किया याचिका का विरोध
भारत सरकार के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह विचारणीय नहीं है। उन्होंने अदालत के समक्ष एस्टेट ऑफिसर द्वारा पारित आदेश भी प्रस्तुत किए और दावा किया कि याचिकाकर्ता को कार्यवाही के दौरान पर्याप्त अवसर दिए गए हैं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने एस्टेट ऑफिसर की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, रिट याचिका पर नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ता को कार्यवाही में शामिल रहने का निर्देश दिया।
नोटिस रद्द करने की मांग
अपनी याचिका में सर शोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड ने सार्वजनिक परिसर (अवैध कब्जेदार बेदखली) अधिनियम की धारा 4 के तहत 11 जून, 2026 को जारी नोटिस को रद्द करने और नई दिल्ली के सुजान सिंह पार्क (उत्तर) की 7.58 एकड़ भूमि से संबंधित एस्टेट ऑफिसर के समक्ष लंबित कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की है।
क्षेत्राधिकार पर उठाया सवाल
कंपनी का कहना है कि एस्टेट ऑफिसर के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि संपत्ति में कथित सरकारी पुनः प्रवेश की वैधता से जुड़ा मामला पहले से ही दिल्ली उच्च न्यायालय में आरएसए संख्या 108/2026 के तहत लंबित है। याचिका में कहा गया है कि कंपनी 1943 से इस संपत्ति पर काबिज है और 1945 में जारी सरकारी अनुदान के तहत उसका अधिकार है। कंपनी का तर्क है कि उसका कब्जा वैध है या नहीं, यह 1960 में हुए कथित सरकारी पुनः प्रवेश की वैधता पर निर्भर करता है, जिस पर अभी न्यायालय में सुनवाई जारी है।
तत्काल हस्तक्षेप की मांग
कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन के बावजूद एस्टेट ऑफिसर ने क्षेत्राधिकार संबंधी प्रारंभिक आपत्तियों पर फैसला किए बिना कार्यवाही आगे बढ़ाई। इसलिए याचिकाकर्ता ने नोटिस रद्द करने और बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए उच्च न्यायालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
(एएनआई)
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