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यूपी में नहीं जायेगी अनुदेशकों की नौकरी

सुप्रीम कोर्ट से यूपी के 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों को मिली बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई के बाद यूपी सरकार की अपील खारिज कर दी है। इससे उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कार्यरत लगभग 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों (अनुदेशकों) को बड़ी राहत मिली है।

सुप्रीम कोर्ट से यूपी के 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों को मिली बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट से यूपी के 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों को मिली बड़ी राहत

प्राथमिक शिक्षकों को दस साल तक 7000 रुपये देना बंधुआ मजदूरी के समान

यूपी में नहीं जायेगी अनुदेशकों की नौकरी, मिलेगा 17 हजार मानदेय

नई दिल्ली।
प्राथमिक शिक्षकों को दस साल तक हर महीने 7000 रुपये देना बंधुआ मजदूरी के समान है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कार्यरत करीब 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों (अनुदेशकों) के मामले में दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए की है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों/प्रशिक्षकों के साथ अनुचित प्रथाओं के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की।

सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई के बाद यूपी सरकार की अपील खारिज कर दी है। इससे उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कार्यरत लगभग 25 हजार अंशकालिक शिक्षकों (अनुदेशकों) को बड़ी राहत मिली है। इन अनुदेशकों की नौकरी समाप्त नहीं होगी और उन्हें मिलने वाले 17 हजार रुपये मासिक मानदेय का रास्ता भी पूरी तरह साफ हो गया है।

 नहीं जायेगी अनुदेशकों की नौकरी, मिलेगा 17 हजार मानदेय

सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों/प्रशिक्षकों के साथ अनुचित प्रथाओं के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की। शीर्ष अदालत ने कहा, राज्य के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों/प्रशिक्षकों को एक दशक से अधिक समय तक मात्र 7000 रुपये प्रति माह मानदेय देना बंधुआ मजदूरी है। शीर्ष कोर्ट ने राज्य सरकार को सभी शिक्षकों को वित्तीय वर्ष 2017-18 से 17000 रुपये प्रति माह का मानदेय देने का निर्देश दिया। बकाया राशि का भुगतान छह महीने के भीतर करना होगा।

यह विवाद वर्ष 2013 के उस सरकारी आदेश से उत्पन्न हुआ, जिसके तहत यूपी सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा योजना) के तहत उच्च प्राथमिक स्कूलों में शारीरिक शिक्षा, कला और अन्य के लिए अनुदेशकों की नियुक्ति 11 महीने की संविदा पर 7,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय पर की थी। हालांकि बाद में मानदेय बढ़ाने के प्रस्ताव रखे गए, वर्ष 2017-18 के लिए प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड ने 17,000 प्रतिमाह मानदेय की मंजूरी भी दी। इसके बावजूद, शिक्षकों को या तो कम राशि दी गई या मानदेय फिर घटाकर 7,000 कर दिया।

मानदेय में संशोधन का अधिकार

जस्टिस पंकज मित्थल और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा, यूपी के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त अंशकालिक संविदा प्रशिक्षकों/ शिक्षकों को 2013 में 11 महीने की संविदा अवधि के लिए निर्धारित उनके 7000 रुपये प्रति माह के मानदेय में संशोधन का अधिकार है। यह संशोधन, यदि वार्षिक रूप से नहीं तो समय-समय पर पीएबी के विवेकानुसार किया जाना चाहिए था। चूंकि पीएबी ने वर्ष 2017-18 के लिए इस मानदेय को 17000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया था, इसलिए इस योजना के तहत नियुक्त सभी प्रशिक्षक /शिक्षक वर्ष 2017-18 से अगले संशोधन तक उपरोक्त दर 17000 रुपये प्रति माह पर मानदेय प्राप्त करने के पात्र हैं।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया, समग्र शिक्षा योजना केंद्र प्रायोजित है। इसमें खर्च केंद्र व राज्य सरकार के बीच 60:40 के अनुपात में साझा होता है। केंद्र की ओर से अपना हिस्सा जारी न करने के कारण राज्य पूरा भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं है। इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, आरटीई की धारा 7(5) राज्य सरकार पर शिक्षकों को भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी डालती है।

यूपी सरकार की अपील को खारिज

शीर्ष अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए यूपी सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने के फैसले का विरोध किया गया था। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविदा की तय अवधि पूरी हो जाने के बावजूद अनुदेशकों की नियुक्ति को केवल संविदात्मक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि सालों से शिक्षा व्यवस्था में योगदान दे रहे इन अनुदेशकों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के इस अहम फैसले से साल 2013 से मानदेय बढ़ोतरी की मांग कर रहे अंशकालिक शिक्षकों को सीधी और बड़ी राहत मिली है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि निर्धारित संविदात्मक अवधि समाप्त होने के बाद भी इन शिक्षकों को कार्य पर बनाए रखा गया और साथ ही उन्हें कहीं और नौकरी करने से भी रोका गया।

जिम्मेदारी से नहीं बच सकती सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में इन शिक्षकों की नियुक्ति को केवल संविदात्मक नहीं माना जा सकता। कोर्ट का मानना है कि जब सरकार स्वयं उनसे लगातार सेवाएं लेती रही, तो ऐसे पदों को स्वतः सृजित (deemed created) माना जाएगा। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि इन परिस्थितियों में राज्य सरकार इन पदों को अस्थायी बताकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।

अनुदेशकों और अंशकालिक शिक्षकों की बड़ी कानूनी जीत

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा है कि अंशकालिक शिक्षकों के साथ सालों से अन्याय किया गया। कोर्ट के इस फैसले को उत्तर प्रदेश के हजारों अनुदेशकों और अंशकालिक शिक्षकों की बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए शिक्षकों को 17,000 रुपये मासिक मानदेय का पूरा लाभ देने के निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी है।

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